आज के व्रत-नियम

आज के व्रत-नियम — 26 जुलाई 2026, रविवार: द्वादशी और एकादशी व्रत का पारण

कैलाश नाथ द्विवेदी ·

[समीक्षक हेतु: प्रकाशन से पूर्व किसी प्रामाणिक पंचांग से तिथि-नक्षत्र अवश्य मिलान करें]

आज रविवार है और आषाढ़ शुक्ल द्वादशी तिथि है — यानी कल मनाई गई देवशयनी एकादशी के व्रत का पारण-दिवस।

रविवार: सूर्य उपासना

परंपरा में रविवार को सूर्य देव की उपासना का दिन माना जाता है। सुबह स्नान के बाद तांबे के लोटे से जल में थोड़ा लाल चंदन व अक्षत डालकर सूर्य को अर्घ्य देने की परंपरा है। इस दिन नमक कम खाने और सात्विक भोजन अपनाने की भी परंपरा रही है।

द्वादशी: एकादशी व्रत का पारण

जिन श्रद्धालुओं ने कल देवशयनी एकादशी का व्रत रखा था, आज द्वादशी तिथि पर सूर्योदय के पश्चात, शास्त्रोक्त पारण-काल में व्रत खोलने की परंपरा है। पारण से पहले भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना कर, तुलसी पत्र सहित नैवेद्य अर्पित करने के बाद ही अन्न ग्रहण करने की सलाह दी जाती है।

  • क्या करें: सूर्योदय के बाद स्नान-पूजा कर उचित समय पर सात्विक भोजन से व्रत खोलें; ज़रूरतमंदों को यथाशक्ति दान-पुण्य करें।
  • क्या टालें: पारण बहुत जल्दबाज़ी में या पूजा-अर्चना से पहले न करें; तामसिक भोजन (लहसुन-प्याज़, मांस-मदिरा) से आज भी परहेज़ की परंपरा है।

पूजा विधि संक्षेप में

प्रातः स्नान के बाद घर के मंदिर में दीपक जलाएं, भगवान विष्णु व सूर्य देव का स्मरण करें, और परिवार के साथ मिलकर सामान्य आरती करें। यह सामान्य परंपरागत जानकारी है — व्यक्तिगत परिस्थिति अनुसार विधि में भिन्नता हो सकती है, अपने पारिवारिक पुरोहित से परामर्श उचित रहेगा।

देवशयनी एकादशी का महत्व

परंपरा में माना जाता है कि आषाढ़ शुक्ल एकादशी से भगवान विष्णु चातुर्मास के लिए योगनिद्रा में चले जाते हैं, और इसी कारण इसे देवशयनी एकादशी कहा जाता है। इसके बाद अगले चार महीनों में विवाह व अन्य मांगलिक कार्य परंपरागत रूप से टाले जाते हैं, और यह समय अधिक साधना, सत्संग व आत्म-चिंतन के लिए उपयुक्त माना जाता है। आज द्वादशी पर व्रत का पारण करते हुए इस चातुर्मास संकल्प की शुरुआत मानी जाती है।

पारण के समय का ध्यान

परंपरा के अनुसार पारण एकादशी के प्रभाव में जल्दबाज़ी में नहीं, बल्कि द्वादशी तिथि लगने के बाद, सूर्योदय उपरांत उचित समय पर करना उत्तम माना जाता है। बहुत जल्दी उठकर व्रत खोलने या भूखे पेट अधिक देर रुकने, दोनों से बचने की सलाह दी जाती है — संतुलन ही परंपरा का मूल भाव है। बुज़ुर्ग या अस्वस्थ सदस्यों के लिए यह लचीलापन परिवार में पहले से समझ लेना अच्छा रहता है, ताकि व्रत श्रद्धा का कारण बने, कठिनाई का नहीं।

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