आज के व्रत-नियम — 20 जुलाई 2026, सोमवार (आषाढ़ शुक्ल सप्तमी)
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आज 20 जुलाई 2026, सोमवार है — आषाढ़ शुक्ल सप्तमी तिथि। सोमवार परंपरागत रूप से भगवान शिव की आराधना का दिन माना जाता है, और कई घरों में आज सोमवार व्रत रखा जाता है।
सोमवार व्रत का महत्व
मान्यता है कि सोमवार का दिन भोलेनाथ को अत्यंत प्रिय है। जो लोग नियमित रूप से या मनोकामना पूर्ति के लिए सोमवार व्रत रखते हैं, वे प्रातः स्नान के बाद शिवलिंग पर जल, दूध और बेलपत्र अर्पित करने की परंपरा निभाते हैं।
पूजा विधि (संक्षेप में)
- प्रातः जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
- शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र और सफ़ेद फूल अर्पित करने की परंपरा है।
- "ॐ नमः शिवाय" मंत्र का जाप शांत मन से करें।
- संध्या में शिव चालीसा या शिव आरती करने की परंपरा कई घरों में प्रचलित है।
आहार-नियम
परंपरा में माना जाता है कि सोमवार व्रत में सात्विक और हल्का भोजन उपयुक्त रहता है। कई लोग एक समय फलाहार करते हैं, तो कुछ पूर्ण उपवास रखते हैं — यह हर परिवार की अपनी परंपरा और सामर्थ्य पर निर्भर करता है। जिन्हें स्वास्थ्य कारणों से उपवास उपयुक्त न हो, वे बिना उपवास के भी श्रद्धा से पूजा-अर्चना कर सकते हैं।
- अपनाएँ: फल, दूध, साबूदाना, कुट्टू का आटा जैसे सात्विक आहार।
- टालें: अनाज, तामसिक भोजन, प्याज़-लहसुन — यह परंपरागत रूप से व्रत में वर्जित माने जाते हैं।
आज की तिथि — सप्तमी
आज आषाढ़ शुक्ल सप्तमी तिथि है, जिसका कोई विशेष प्रचलित व्रत नहीं है, इसलिए आज का मुख्य महत्व सोमवार और शिव-आराधना का ही है। तिथि रात्रि के बाद अष्टमी में परिवर्तित होगी।
सोमवार व्रत किसके लिए उपयुक्त माना जाता है
परंपरा में कहा जाता है कि सोमवार व्रत विशेष रूप से मनोकामना पूर्ति, संतान-सुख और वैवाहिक जीवन में सामंजस्य के लिए रखा जाता है। कुँवारी कन्याएँ भी अक्सर योग्य वर की कामना से यह व्रत रखती हैं, और विवाहित स्त्री-पुरुष पारिवारिक सुख-शांति के लिए। यह मान्यता पीढ़ियों से चली आ रही है, हर परिवार अपनी श्रद्धा और परंपरा के अनुसार इसे निभाता है।
व्रत के दौरान इन बातों का ध्यान रखें
- व्रत के दिन मन को शांत रखें, क्रोध और वाद-विवाद से बचने का प्रयास करें।
- घर में शिव मंदिर जाना संभव हो तो अवश्य जाएँ, अन्यथा घर पर ही शिव जी का सच्चे मन से स्मरण करें।
- व्रत खोलते समय भी सात्विक भोजन ही ग्रहण करें, एकदम से भारी भोजन न करें।
जिन्हें स्वास्थ्य कारणों से पूर्ण उपवास संभव न हो, वे केवल श्रद्धा-भाव से पूजा-पाठ करके भी इस परंपरा को निभा सकते हैं — शास्त्रों में भाव को सर्वोपरि माना गया है, कठोरता को नहीं।
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