स्वास्थ्य एवं योग

स्वास्थ्य एवं योग: वर्षा ऋतु में अर्धमत्स्येन्द्रासन और जीरा-अजवाइन जल से रखें सेहत का ख्याल

सोनी मिश्रा ·

बारिश के मौसम में हल्का सा भारी खाना भी पेट में भारीपन बना देता है, और सुबह उठते ही थकान महसूस होती है। वर्षा ऋतु में शरीर की पाचन-अग्नि स्वाभाविक रूप से कमज़ोर हो जाती है — यही आयुर्वेद और योग परंपरा दोनों बार-बार समझाते हैं।

आज का आसन: अर्धमत्स्येन्द्रासन

रीढ़ की हल्की मरोड़ वाला यह आसन — अर्धमत्स्येन्द्रासन — पेट के अंगों को हल्के से दबाव देकर पाचन-तंत्र को सक्रिय करने में सहायक माना जाता है। सुबह खाली पेट, दरी पर बैठकर, एक पैर मोड़कर दूसरी ओर धड़ को धीरे से मोड़ें। झटका न दें, साँस सामान्य रखें और 20-30 सेकंड रुककर धीरे से वापस आएँ। दोनों तरफ़ बराबर बार दोहराएँ।

प्राणायाम: भस्त्रिका के पहले अनुलोम-विलोम

वर्षा ऋतु में वातावरण में नमी अधिक रहती है, इसलिए योग परंपरा में पहले अनुलोम-विलोम प्राणायाम से शुरुआत करने की सलाह दी जाती है ताकि शरीर धीरे-धीरे गर्मी पकड़े। इसके बाद ही भस्त्रिका जैसे तेज़ प्राणायाम करने की परंपरा रही है।

आहार: जीरा-अजवाइन का पानी

आयुर्वेद के अनुसार माना जाता है कि वर्षा ऋतु में हल्का, गरम और सुपाच्य भोजन ही शरीर के लिए उपयुक्त रहता है। सुबह हल्का गुनगुना जीरा-अजवाइन का पानी पीने की पुरानी घरेलू परंपरा रही है, जो पाचन में सहायक मानी जाती है। भोजन में मूंग दाल, हल्की सब्ज़ियाँ और ताज़ा बना खाना प्राथमिकता दें।

क्या अपनाएँ

  • भोजन ताज़ा और हल्का लें, बासी या तला-भुना कम करें।
  • सुबह सूर्योदय के आसपास टहलना या हल्का योग करें।
  • पानी उबालकर, ठंडा करके पीने की परंपरा इस मौसम में विशेष लाभकारी मानी जाती है।

क्या टालें

परंपरा में माना जाता है कि वर्षा ऋतु में अधिक तला-भुना, अधिक ठंडा या बासी भोजन पाचन को और कमज़ोर कर सकता है। भारी व्यायाम और अत्यधिक परिश्रम से भी इस मौसम में बचने की सलाह दी जाती रही है। यह सामान्य परंपरागत जानकारी है, किसी भी स्वास्थ्य समस्या में चिकित्सक की सलाह लें।

दिनचर्या में छोटे बदलाव, बड़ा फ़र्क़

ऋतुचर्या की परंपरा कहती है कि मौसम बदलते ही दिनचर्या में भी थोड़ा बदलाव ज़रूरी है। वर्षा ऋतु में शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता स्वाभाविक रूप से कुछ कमज़ोर मानी जाती है, इसलिए नींद पूरी लेना, भीगने के बाद तुरंत शरीर पोंछना और गीले कपड़े देर तक न पहनना — यह सब छोटी लेकिन ज़रूरी सावधानियाँ हैं। सुबह उठकर एक गिलास गुनगुना पानी पीना भी परंपरा में पाचन के लिए अच्छा माना जाता है।

योग को दिनचर्या का हिस्सा बनाएँ

अर्धमत्स्येन्द्रासन के साथ सप्ताह में इसे नियमित करें तो असर बेहतर दिखता है। योग परंपरा मानती है कि शरीर के साथ मन को भी स्थिर रखना ज़रूरी है — इसलिए आसन के बाद कुछ मिनट शांत बैठकर लंबी, गहरी साँस लेना न भूलें। यह मन की चंचलता को कम करके एकाग्रता बढ़ाने में सहायक माना जाता है, जो दिनभर के कामकाज में भी काम आता है।

ध्यान रखें, यह सामान्य पारंपरिक जानकारी है — किसी बीमारी, गर्भावस्था या शारीरिक समस्या में योग व आसन करने से पहले अनुभवी योग शिक्षक और चिकित्सक की सलाह अवश्य लें।

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