स्वास्थ्य एवं योग: वर्षा ऋतु में आयुर्वेद के अनुसार दिनचर्या
बाहर झमाझम बारिश हो रही है, आसमान में बादल घिरे हैं — आषाढ़ का यह मौसम मन को भाता तो है, पर शरीर के लिए यह एक नाज़ुक समय भी है। आयुर्वेद के अनुसार वर्षा ऋतु में पाचन अग्नि (जठराग्नि) स्वाभाविक रूप से कमज़ोर पड़ जाती है, इसलिए इस मौसम की अपनी एक विशेष ऋतुचर्या मानी गई है।
भोजन में क्या अपनाएँ
- परंपरा में माना जाता है कि इस मौसम में हल्का, ताज़ा पका और गुनगुना भोजन पाचन में सहायक होता है।
- अदरक, काली मिर्च, हींग और जीरे का प्रयोग भोजन में बढ़ाना लाभकारी माना जाता है, क्योंकि ये पाचन अग्नि को संतुलित रखने में मदद करते हैं।
- पानी हमेशा उबालकर, हल्का गुनगुना करके पिएँ — यह वर्षा ऋतु के लिए विशेष रूप से बताया गया है।
- मूंग की दाल, लौकी, तोरई जैसी सुपाच्य सब्ज़ियाँ सात्विक भोजन में शामिल करें।
किससे परहेज़ करें
- कच्चा सलाद और बिना धुली पत्तेदार सब्ज़ियाँ इस मौसम में टालना बेहतर माना जाता है।
- अत्यधिक तला-भुना और भारी भोजन पाचन पर बोझ डाल सकता है, ऐसा परंपरा में कहा गया है।
- दिन में देर तक सोने और अत्यधिक आलस्य से बचने की सलाह दी जाती है।
आज का योग एवं प्राणायाम
वर्षा ऋतु में बाहर घूमना कठिन होता है, इसलिए घर के भीतर ही हल्का अभ्यास पर्याप्त है। भोजन के बाद कुछ मिनट वज्रासन में बैठना पाचन में सहायक माना जाता है। सुबह खाली पेट पाँच से सात मिनट अनुलोम-विलोम (नाड़ी शोधन प्राणायाम) करने से मन शांत रहता है और श्वसन तंत्र मज़बूत होता है। साथ ही ताड़ासन और भुजंगासन का हल्का अभ्यास शरीर में हल्कापन बनाए रखता है।
ध्यान रहे — यह जानकारी सामान्य पारंपरिक जीवनशैली मार्गदर्शन है, चिकित्सकीय सलाह नहीं। किसी भी स्वास्थ्य समस्या में चिकित्सक से परामर्श अवश्य लें।
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