स्वास्थ्य एवं योग

वर्षा ऋतु में अनुलोम-विलोम प्राणायाम और हल्का सात्विक भोजन — मानसून में सेहत का ध्यान

सोनी मिश्रा ·

जुलाई की उमस भरी बारिश में शरीर का मन कुछ और होता है और भूख कुछ और मांगती है। आयुर्वेद में इसे वर्षा ऋतुचर्या कहा गया है — यानी बरसात के मौसम के हिसाब से बदला हुआ दिनचर्या।

वर्षा ऋतु में शरीर का स्वभाव

आयुर्वेद के अनुसार माना जाता है कि वर्षा ऋतु में पाचन-अग्नि (जठराग्नि) थोड़ी कमज़ोर पड़ जाती है, जबकि वात दोष बढ़ने लगता है। इसी वजह से इस मौसम में भारी, तला और बासी भोजन जल्दी परेशान करता है।

सात्विक भोजन में क्या शामिल करें

  • हल्का, ताज़ा पका और गरम भोजन — जैसे मूंग दाल की खिचड़ी, हल्की सब्ज़ियाँ।
  • अदरक, हींग, जीरा और काली मिर्च जैसे मसाले, जो परंपरा में पाचन बढ़ाने वाले माने जाते हैं।
  • उबला हुआ या हल्का गुनगुना पानी, ताकि पाचन तंत्र पर ज़ोर न पड़े।

क्या टालें

  • सड़क किनारे के तले-भुने और कटे हुए खुले फल — बरसात में जल्दी दूषित हो सकते हैं।
  • बहुत ठंडा या फ्रिज का भोजन, जो पाचन को और सुस्त बना सकता है।
  • रात में देर तक भारी भोजन करना।

आज का अभ्यास: अनुलोम-विलोम प्राणायाम

योग परंपरा में अनुलोम-विलोम (नाड़ी शोधन प्राणायाम) को मन शांत करने और श्वास संतुलित रखने वाला अभ्यास माना जाता है। सुबह खाली पेट, शांत जगह पर बैठकर:

  1. दाहिने अंगूठे से दाहिनी नासिका बंद करें, बाईं नासिका से धीरे सांस अंदर लें।
  2. अब बाईं नासिका को उंगली से बंद करें, दाहिनी नासिका से सांस बाहर छोड़ें।
  3. यही क्रम उल्टा दोहराएं — यह एक चक्र हुआ। शुरुआत में 5-7 मिनट पर्याप्त है।

यह सामान्य कल्याण अभ्यास है, किसी बीमारी का उपचार नहीं। यदि कोई स्वास्थ्य समस्या हो तो चिकित्सक से सलाह लेना ही उचित है।

दिनचर्या में छोटे बदलाव

वर्षा ऋतुचर्या में यह भी माना जाता है कि इस मौसम में शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता स्वाभाविक रूप से कुछ कमज़ोर रहती है। इसलिए दिन में खुले पानी में भीगने से बचना, गीले कपड़े जल्दी बदलना और पैरों को सूखा रखना — ये छोटी आदतें परंपरा में सेहत बनाए रखने के लिए बताई गई हैं।

  • सुबह उठकर हल्का गुनगुना पानी पीने की परंपरा, ताकि पाचन तंत्र धीरे-धीरे सक्रिय हो।
  • दिन में हल्की सैर या स्ट्रेचिंग, भारी व्यायाम से बचते हुए।
  • रात को समय पर सोना, ताकि शरीर को मौसम के बदलाव से तालमेल बिठाने का पूरा समय मिले।

इन सबका मकसद केवल इतना है कि मौसम के साथ शरीर का तालमेल बना रहे। यह कोई चिकित्सकीय उपचार नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही सेहतमंद जीवनशैली की परंपरा है।

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