भजनावली: ॐ जय शिव ओंकारा — पारंपरिक शिव आरती और उसका भावार्थ
सावन के महीने में हर शिव मंदिर में जो आरती सबसे ज़्यादा गूंजती है, वह है "ॐ जय शिव ओंकारा"। यह आरती पंडित शारदा राम फिल्लौरी द्वारा रचित मानी जाती है और उत्तर भारत के लगभग हर घर व मंदिर में शिव पूजा के समय गाई जाती है।
आरती का पूर्ण पाठ
ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।
ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥ ॐ जय शिव ओंकारा
एकानन चतुरानन पंचानन राजे।
हंसासन गरुड़ासन वृषवाहन साजे॥ ॐ जय शिव ओंकारा
दो भुज चार चतुर्भुज दसभुज अति सोहे।
त्रिगुण रूप निरखते त्रिभुवन जन मोहे॥ ॐ जय शिव ओंकारा
अक्षमाला वनमाला मुण्डमाला धारी।
त्रिपुरारी कंसारी कर माला धारी॥ ॐ जय शिव ओंकारा
श्वेताम्बर पीताम्बर बाघम्बर अंगे।
सनकादिक गरुणादिक भूतादिक संगे॥ ॐ जय शिव ओंकारा
कर के मध्य कमंडलु चक्र त्रिशूलधारी।
सुखकारी दुखहारी जगपालनकारी॥ ॐ जय शिव ओंकारा
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका।
प्रणवाक्षर मध्ये ये तीनों एका॥ ॐ जय शिव ओंकारा
काशी में विश्वनाथ विराजत नंदी ब्रह्मचारी।
नित उठ हर गुण गावत सकल मुनीश्वर नर नारी॥ ॐ जय शिव ओंकारा
त्रिगुणस्वामी जी की आरती जो कोई नर गावे।
कहत शिवानंद स्वामी सुख संपत्ति पावे॥ ॐ जय शिव ओंकारा
आरती का भावार्थ
इस आरती में शिव जी के अनेक रूपों का वर्णन है — कहीं वे ब्रह्मा-विष्णु सहित त्रिदेव स्वरूप में हैं, कहीं एक मुख वाले तो कहीं पंचमुखी रूप में। उनके हाथों में कमंडल, चक्र और त्रिशूल हैं, जो बताते हैं कि वे संहारक भी हैं और पालनकर्ता भी। आरती की एक पंक्ति विशेष रूप से हमारी काशी से जुड़ी है — "काशी में विश्वनाथ विराजत" — यह बताती है कि भगवान शिव स्वयं काशी में नंदी के साथ विराजमान हैं, और यहां हर दिन मुनि, स्त्री-पुरुष सभी उनका गुणगान करते हैं।
आरती के अंत में कहा गया है कि जो भी श्रद्धा से इस आरती का पाठ करता है, उसे सुख और समृद्धि प्राप्त होती है — यह भाव भक्त और भगवान के बीच के सरल, निश्छल संबंध को दर्शाता है।
सावन में इस आरती का महत्व
सावन का महीना और शनिवार का दिन — दोनों ही भक्ति और संयम के प्रतीक माने जाते हैं। इस समय परिवार सहित संध्या आरती में यह भजन गाना घर में सकारात्मकता व शांति लाने की परंपरा मानी जाती है।
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