भजनावली

भजनावली: ॐ जय जगदीश हरे — पंडित श्रद्धा राम फिल्लौरी की अमर आरती का भावार्थ

आनंद दुबे ·

शाम होते ही जब मंदिर की घंटियाँ बजती हैं, तो जो एक आरती लगभग हर घर में गूंजती है, वह है — "ॐ जय जगदीश हरे"। यह आरती इतनी लोकप्रिय है कि बहुत कम लोग जानते हैं कि इसे किसने रचा था।

रचयिता का परिचय

इस आरती की रचना 19वीं सदी में पंडित श्रद्धा राम फिल्लौरी ने की थी, जो पंजाब के एक विद्वान संत और समाज-सुधारक थे। उन्होंने यह आरती भगवान विष्णु की स्तुति में लिखी, और आज यह हर सम्प्रदाय के मंदिरों में समान श्रद्धा से गाई जाती है।

आरती का पाठ

ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे।
भक्त जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥

जो ध्यावे फल पावे, दुख बिनसे मन का।
सुख सम्पत्ति घर आवे, कष्ट मिटे तन का॥ ॐ जय जगदीश हरे॥

मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूं किसकी।
तुम बिन और न दूजा, आस करूं जिसकी॥ ॐ जय जगदीश हरे॥

तुम पूरन परमात्मा, तुम अंतर्यामी।
पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सबके स्वामी॥ ॐ जय जगदीश हरे॥

तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता।
मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता॥ ॐ जय जगदीश हरे॥

भावार्थ

इस आरती में भक्त भगवान को जगत का स्वामी और पालनहार मानते हुए विनती करता है कि वे उसके सारे कष्ट और संकट दूर करें। "मात-पिता तुम मेरे" पंक्ति में भक्त यह भाव व्यक्त करता है कि जिस तरह माता-पिता संतान की रक्षा करते हैं, वैसे ही ईश्वर हर भक्त के सच्चे संरक्षक हैं। पूरी आरती में समर्पण, विश्वास और कृतज्ञता का भाव प्रमुख है — यह किसी एक संकट को दूर करने की मांग नहीं, बल्कि जीवन भर के लिए ईश्वर की शरण में रहने की भावना है।

घर में आरती करने की परंपरा

परंपरा में शाम के समय दीपक जलाकर, पूरे परिवार के साथ मिलकर यह आरती गाने की प्रथा रही है। यह न केवल भक्ति भाव जगाती है, बल्कि परिवार को दिन के अंत में एक साथ जोड़ने का भी काम करती है।

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