भजनावली

भजनावली: जय गणेश देवा — पारंपरिक गणेश आरती और उसका भावार्थ

आनंद दुबे ·

शाम की आरती के समय जो स्वर हर घर और हर मंदिर में सबसे पहले गूँजता है, वह है — "जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा।" यह आरती सदियों से सनातन परंपरा में लोक-कंठ से लोक-कंठ तक पहुँची है, इसीलिए इसे पारंपरिक लोक-आरती कहा जाता है। आज भजनावली में यही आरती और उसका सरल भावार्थ जानते हैं।

आरती का पाठ

जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥

एक दंत दयावंत, चार भुजा धारी।
माथे पर तिलक सोहे, मूसे की सवारी॥
जय गणेश, जय गणेश...

पान चढ़े, फूल चढ़े, और चढ़े मेवा।
लड्डुअन का भोग लगे, संत करें सेवा॥
जय गणेश, जय गणेश...

अंधन को आंख देत, कोढ़िन को काया।
बांझन को पुत्र देत, निर्धन को माया॥
जय गणेश, जय गणेश...

हार-चढ़े, फूल-चढ़े, और चढ़े दूर्वा।
कृपा करो महाराज, पूरण कीजो हमरी सेवा॥
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा॥

भावार्थ

यह आरती भगवान गणेश की स्तुति है, जो माता पार्वती और पिता महादेव के पुत्र माने जाते हैं। "एक दंत दयावंत, चार भुजा धारी" कहकर उनके स्वरूप — एक दाँत, चार भुजाएँ, माथे पर तिलक और मूषक की सवारी — का सुंदर वर्णन किया गया है।

अगली पंक्तियों में भक्त द्वारा अर्पित पान, फूल, मेवा और लड्डू के भोग का उल्लेख है, जो श्रद्धा और समर्पण का प्रतीक है। "अंधन को आंख देत, कोढ़िन को काया, बांझन को पुत्र देत, निर्धन को माया" पंक्ति में भगवान की करुणा और सामर्थ्य का भाव है — यह सदियों पुरानी लोक-आस्था की भाषा है, जो भक्त के हृदय में भरोसा जगाती है कि सच्चे मन से पुकारने पर भगवान सुनते हैं।

अंतिम पंक्तियों में भक्त बहुत विनम्रता से प्रार्थना करता है कि उसकी सेवा-भक्ति स्वीकार हो और उसकी मनोकामना पूर्ण हो — पूरी आरती में कहीं भी किसी चमत्कार या तत्काल फल की माँग नहीं, बल्कि श्रद्धा और समर्पण का भाव प्रधान है।

कब गाएँ

यह आरती किसी भी शुभ कार्य के आरंभ में, गणेश चतुर्थी पर, या प्रतिदिन संध्या-आरती में गाई जा सकती है — किसी भी नए काम की शुरुआत में सबसे पहले गणेश-वंदना करने की परंपरा सदियों पुरानी है, चाहे वह पूजा हो, विवाह हो या कोई नया उपक्रम।

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