बच्चों की कहानियाँ: ध्रुव की कहानी — जब कोई ताना मारे तो क्या करें
अर्णव की क्लास में हर साल एक ही ड्रामा होता था — इनाम बंटने की स्टेज पर सबसे आगे की कुर्सी हमेशा टॉपर बच्चों के लिए रिज़र्व रहती थी। इस बार जब अर्णव आगे बढ़कर बैठने लगा, तो एक सीनियर लड़के ने हँसते हुए कहा — "ये कुर्सी तेरे लिए नहीं है, यहाँ सिर्फ टॉपर बैठते हैं, तू तो बस ठीक-ठाक मार्क्स लाता है।" पूरी क्लास हँस पड़ी। अर्णव का चेहरा लाल हो गया, आँखों में आँसू आ गए, और वह चुपचाप उठकर पीछे चला गया।
यह ठीक वैसी ही तकलीफ़ थी, जो हज़ारों साल पहले एक छोटे बालक ध्रुव ने महसूस की थी। यह कहानी श्रीमद्भागवत पुराण के चतुर्थ स्कंध में आती है। राजा उत्तानपाद के दो रानियाँ थीं — सुरुचि और सुनीति। एक दिन छोटा ध्रुव (सुनीति का पुत्र) अपने पिता की गोद में बैठना चाहता था, तभी सुरुचि ने उसे धक्का देते हुए कहा — "यह गोद तेरे लिए नहीं, यहाँ सिर्फ मेरा पुत्र बैठेगा।" ध्रुव रोता हुआ अपनी माँ के पास गया।
आगे क्या हुआ
ध्रुव की माँ ने उसे समझाया कि दुःखी होने की जगह मेहनत से खुद को साबित करो। छोटे ध्रुव ने ठान लिया कि वह ऐसा स्थान पाएगा जो कभी न डगमगाए। वह वन में गया, कठिन तपस्या की, और अंततः उसे वह स्थान मिला जिसे आज भी हम आसमान में देखते हैं — ध्रुव तारा यानी पोल स्टार, जो अपनी जगह से कभी नहीं हिलता।
अर्णव ने भी घर जाकर यही सोचा। उसने बदला लेने या झगड़ा करने की जगह हर दिन थोड़ा-थोड़ा ज़्यादा पढ़ना शुरू किया, कोच से एक्स्ट्रा प्रैक्टिस माँगी, और छह महीने बाद जब स्कूल की क्विज़ टीम चुनी गई, तो अर्णव का नाम सबसे ऊपर था। उस सीनियर लड़के ने भी उसे बधाई दी। अर्णव मुस्कुराया — उसे किसी की माफ़ी नहीं चाहिए थी, बस अपने मेहनत पर भरोसा था।
मज़े की बात यह है कि अर्णव ने कभी उस सीनियर लड़के से बदला लेने की नहीं सोची। जब दोस्तों ने पूछा — "तूने उसे कुछ जवाब क्यों नहीं दिया?", तो अर्णव ने बस इतना कहा — "जवाब देने में समय बर्बाद करने से अच्छा है, कुछ करके दिखा दूँ।" ठीक वैसे ही जैसे ध्रुव ने अपनी सौतेली माँ से झगड़ा करने की बजाय जंगल का रास्ता चुना था।
सीखः
जो ताने का जवाब गुस्से से नहीं, मेहनत से देता है, वह ध्रुव तारे जैसा अटल बन जाता है।
बच्चों को यह कहानी सुनाकर पूछें — क्या उन्हें भी कभी ऐसा महसूस हुआ है, और उन्होंने उस पल में क्या किया था? रात को आसमान में ध्रुव तारा दिखाकर उन्हें यह कहानी फिर से याद दिलाई जा सकती है। ऐसी और प्रेरक कहानियों के लिए हमारा ब्लॉग देखें, और मंदिर के बाल-संस्कार कार्यक्रमों की जानकारी के लिए कार्यक्रम पृष्ठ पर जाएँ।