बच्चों के लिए कहानियाँ

बच्चों की कहानी: एकलव्य की लगन — आज बिना कोचिंग के मेहनत करने वाले बच्चे की जीत

आनंद दुबे ·

अंश आठवीं कक्षा में पढ़ता था। स्कूल की क्रिकेट टीम में सब बच्चे महंगी अकादमी से कोचिंग लेकर आते थे, बल्ले भी नए-नए, जूते भी ब्रांडेड। अंश के पास न कोचिंग थी, न नया बल्ला — बस एक पुराना बल्ला और मोबाइल पर मुफ्त में मिलने वाले कोचिंग वीडियो। ट्रायल से पहले उसके दोस्त ने ताना मारा, "बिना कोच के क्या खाक खेलेगा!" अंश उदास होकर घर आया और दादी के पास बैठ गया। दादी ने उसका मन पढ़ लिया और मुस्कुराकर महाभारत की एक पुरानी कथा सुनाई।

महाभारत की एकलव्य-कथा

निषादराज के पुत्र एकलव्य को धनुर्विद्या सीखनी थी। वह गुरु द्रोणाचार्य के पास गया, पर द्रोणाचार्य ने उसे शिष्य बनाने से मना कर दिया। एकलव्य निराश नहीं हुआ। उसने वन में मिट्टी की एक मूर्ति बनाई, उसे ही गुरु द्रोणाचार्य मानकर हर दिन अकेले अभ्यास किया। सुबह-शाम, बिना नागा किए, वह लक्ष्य साधने का अभ्यास करता रहा। न कोई सिखाने वाला था, न कोई देखने वाला — बस लगन थी। धीरे-धीरे वह इतना कुशल धनुर्धर बन गया कि उसकी विद्या स्वयं द्रोणाचार्य के शिष्यों से भी आगे निकल गई।

एकलव्य की कहानी में एक कठिन मोड़ भी आता है, जहाँ गुरु-दक्षिणा में उससे बड़ा त्याग माँगा गया। यह हिस्सा सुनकर अंश उदास हो गया, पर दादी ने समझाया — "बेटा, इस कथा में जो बात हमें याद रखनी है, वह है एकलव्य की अटूट लगन और गुरु के प्रति सच्चा सम्मान, भले ही गुरु सामने न हों। साधन कितने भी कम हों, मेहनत से कोई नहीं रोक सकता।"

अंश की मेहनत रंग लाई

दादी की बात सुनकर अंश को समझ आया — साधन बड़े हों या छोटे, असली गुरु मेहनत और लगन ही होती है। उसने हर शाम मोबाइल पर वीडियो देखकर, घर की छत पर अकेले अभ्यास करना शुरू किया। दीवार पर चॉक से एक निशान बनाकर वह घंटों उसी पर गेंद फेंकने और बल्ला घुमाने का अभ्यास करता। कोई देखे या न देखे, वह रोज़ प्रैक्टिस करता रहा, बारिश के दिनों में भी घर के अंदर ही थोड़ा अभ्यास कर लेता। ट्रायल के दिन जब उसने लगातार अच्छे शॉट खेले, तो कोच भी हैरान रह गए। टीम में उसका चुनाव हो गया — बिना किसी महंगी कोचिंग के, सिर्फ लगन और अनुशासन के दम पर। जिस दोस्त ने ताना मारा था, उसी ने अब अंश से टिप्स माँगनी शुरू कर दी।

सीख

सच्ची लगन और गुरु के प्रति सम्मान से सीखने वाला कभी पीछे नहीं रहता, चाहे साधन कितने भी सीमित क्यों न हों।

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