बच्चों की कहानी: कर्ण का दान — आज एक्ज़ाम से पहले प्रतिद्वंद्वी की मदद करने वाला लड़का
अर्णव दसवीं की बोर्ड परीक्षा की तैयारी में जुटा था। उसका सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी, रोहन, गणित में हमेशा उससे आगे रहता था। दोनों में एक अनकही होड़ चलती रहती थी — कौन टॉप करेगा।
एक दिन रोहन क्लास में उदास बैठा था। उसकी नोट्स वाली कॉपी बारिश में भीग गई थी, ठीक परीक्षा से एक हफ़्ते पहले। पूरे साल की मेहनत के नोट्स — गणित के सारे फॉर्मूले, ट्रिक्स — सब धुँधले हो चुके थे। अर्णव के पास वही नोट्स एकदम साफ़ मौजूद थे, जिन्हें बनाने में उसने महीनों लगाए थे।
अर्णव के मन में एक पल को विचार आया — "अगर मैं यह कॉपी नहीं दूँ, तो शायद टॉप मैं ही करूँ।" लेकिन फिर उसे दादी से सुनी महाभारत की एक कहानी याद आई।
कर्ण का कवच-कुंडल
महाभारत में कर्ण जन्म से ही दिव्य कवच और कुंडल पहने हुए था, जो उसे हर युद्ध में लगभग अजेय बनाते थे। एक दिन देवराज इंद्र, अर्जुन की रक्षा के लिए, ब्राह्मण का भेष धरकर कर्ण के पास भिक्षा माँगने आए। कर्ण जानता था कि यह ब्राह्मण असल में कौन है, और यह भी जानता था कि कवच-कुंडल दान करने के बाद युद्ध में उसकी जान को ख़तरा बढ़ जाएगा। फिर भी, अपने इस नियम पर अडिग रहते हुए कि द्वार पर आया कोई भी याचक कभी खाली हाथ नहीं लौटेगा, कर्ण ने अपने कवच-कुंडल उतारकर इंद्र को दान कर दिए — बिना किसी शिकायत के।
अर्णव का फैसला
दादी की यह कहानी याद आते ही अर्णव को एक बात समझ आई — कर्ण जानता था कि इससे उसे नुकसान होगा, फिर भी उसने अपने वचन और अपनी उदारता को नहीं छोड़ा। अर्णव ने भी सोचा, "अगर मैं आज मदद नहीं करूँगा, तो टॉप करने का मतलब ही क्या रह जाएगा?"
अगले दिन अर्णव अपनी नोट्स की कॉपी लेकर रोहन के घर गया और बोला, "ले जा, फोटोकॉपी करवा ले। मुझे भी बाकी बचे विषयों की तैयारी करनी है, साथ पढ़ेंगे।" दोनों ने मिलकर पढ़ाई की, और परीक्षा में दोनों के अच्छे नंबर आए। जो दोस्ती बनी, वह नंबरों से कहीं ज़्यादा कीमती निकली।
सीख: असली बड़प्पन तब है जब हम अपने फ़ायदे को छोड़कर भी दूसरे की मदद करें, ठीक कर्ण की तरह।
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