बच्चों के लिए कहानियाँ

बच्चों की कहानी: राजा शिबि का वचन — आज एक कमजोर दोस्त की रक्षा

आनंद दुबे ·

रोहन आठवीं कक्षा में पढ़ता था। टिफिन टाइम में जब सारे बच्चे मैदान की तरफ भागे, उसने देखा कि कुछ सीनियर लड़के छोटी कक्षा के एक बच्चे — अंश — को घेरकर उसका टिफिन छीन रहे थे। रोहन को उसी वक्त याद आई वो कहानी जो उसके दादाजी ने सुनाई थी — राजा शिबि की कहानी।

महाभारत की कथा

महाभारत के वन पर्व में वर्णित इस कथा के अनुसार, एक बार एक कबूतर डर के मारे उड़ता हुआ राजा शिबि की गोद में आ गिरा। उसके पीछे एक बाज़ आया और बोला, "यह मेरा शिकार है, इसे मुझे सौंप दो, यही प्रकृति का नियम है।" राजा शिबि ने कबूतर को शरण दे दी थी, इसलिए उसे लौटाना उन्हें अनुचित लगा। पर बाज़ की भूख भी सच्ची थी।

राजा शिबि ने कहा — "मैं इस कबूतर के बदले अपने शरीर से उतना ही मांस तुम्हें दूँगा, जितना इसका वज़न है।" तराजू पर जब कबूतर को तौला गया, तो राजा शिबि का शरीर हल्का पड़ने लगा — जितना मांस वे काटकर रखते, तराजू फिर भी कबूतर की तरफ झुका रहता। अंत में राजा स्वयं तराजू पर बैठ गए। यह देखकर बाज़ और कबूतर दोनों ने अपना असली रूप प्रकट किया — वे देवता थे, जो राजा शिबि की करुणा और वचन-निष्ठा की परीक्षा लेने आए थे।

आज के मैदान पर

रोहन के पास तराजू नहीं था, न ही वह अकेला उन सीनियर लड़कों से भिड़ सकता था। पर उसने वही किया जो वह कर सकता था — वह सीधा टीचर के पास गया और सारी बात बताई। साथ ही उसने अंश के पास जाकर कहा, "चल, मेरे साथ बैठकर खाना खा, अब कोई तुझे तंग नहीं करेगा।"

बात छोटी थी, पर उसमें वही भावना थी जो राजा शिबि की कथा सिखाती है — जो शरण में आया है, उसकी रक्षा करना, चाहे इसके लिए खुद को असुविधा ही क्यों न उठानी पड़े। रोहन ने न तराजू पर बैठकर मांस दिया, न कोई बड़ा त्याग किया — पर उसने अपनी छोटी ताकत का सही इस्तेमाल किया।

अगले दिन अंश और उसके दो-तीन दोस्त रोहन के साथ टिफिन शेयर करने लगे। रोहन को समझ आया कि राजा शिबि जैसा बड़ा त्याग हर कोई नहीं कर सकता, पर हर कोई इतना तो कर ही सकता है कि जब कोई कमजोर मदद माँगे, तो आँखें न फेरे।

सीख

जो हमारी शरण में है या हमसे मदद माँगता है, उसकी रक्षा करना — चाहे बदले में हमें कुछ भी न मिले — यही सच्चा साहस है। बड़ा बलिदान देना जरूरी नहीं, बस अपनी छोटी ताकत का सही समय पर सही इस्तेमाल करना ही काफी है।

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