बच्चों की कहानी: प्रह्लाद की सच्चाई और आज के क्लासरूम में भीड़ से अलग खड़े होने की हिम्मत
क्लास में सब बच्चे मोबाइल गेम खेलने की होड़ में थे। सिर्फ एक लड़का, अर्णव, रोज़ शाम को पढ़ाई करता और अपने दादाजी के साथ मंदिर जाता। बाकी बच्चे उसे चिढ़ाते — "तू तो बड़ा साधु बन गया है!" पर अर्णव मुस्कुरा देता और अपने रास्ते पर चलता रहता।
एक दिन दादाजी ने पूछा, "तुझे बुरा नहीं लगता जब सब मज़ाक बनाते हैं?" अर्णव ने कहा, "थोड़ा लगता है, पर आप ही ने तो प्रह्लाद की कहानी सुनाई थी न!"
श्रीमद्भागवत पुराण की कथा
यह कथा भागवत पुराण में आती है। हिरण्यकशिपु नाम का एक शक्तिशाली राजा था, जो खुद को ही भगवान मानने पर अड़ा था। उसका बेटा प्रह्लाद बचपन से ही भगवान विष्णु का भक्त था। राजा को यह बिलकुल पसंद नहीं आया। उसने प्रह्लाद को डराया, धमकाया, यहाँ तक कि उसे हाथी के पैरों तले कुचलवाने और आग में फेंकवाने की भी कोशिश की।
पर प्रह्लाद न डरा, न झुका। हर बार वह शांत मन से अपनी बात पर टिका रहा — "जो सच है, वही मेरा भरोसा है।" अंत में जब हिरण्यकशिपु ने पूछा, "बता, तेरा भगवान इस खंभे में भी है?" तो नरसिंह भगवान उसी खंभे से प्रकट हुए और प्रह्लाद की रक्षा हुई।
आज के क्लासरूम में सीख
अर्णव को भी कभी-कभी अकेला महसूस होता, पर उसे याद रहता कि प्रह्लाद अकेले खड़े रहकर भी सही साबित हुआ था। धीरे-धीरे कुछ बच्चे उसकी लगन देखकर खुद भी पढ़ाई में जुट गए, और साल के अंत में अर्णव क्लास में सबसे अच्छे नंबरों से पास हुआ।
जो सही लगे, उस पर टिके रहना कभी आसान नहीं होता — न प्रह्लाद के लिए था, न आज के किसी बच्चे के लिए है। पर भीड़ के मज़ाक से डरकर अपनी राह बदलना समझदारी नहीं है।
सीख: जो सही है उस पर भरोसा रखो, भले ही शुरुआत में तुम अकेले खड़े हो।
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