बच्चों के लिए कहानियाँ

बच्चों की कहानी: श्रवण कुमार की सेवा और आज के मोबाइल फोन के दौर की सीख

आनंद दुबे ·

रोहन स्कूल से आते ही सीधा अपने कमरे में घुस जाता और मोबाइल में गेम खेलने लगता। मम्मी-पापा कुछ पूछते तो बस "हां-हूं" में जवाब मिलता। एक शाम दादी ने उसे पास बुलाया और कहा, "बेटा, एक कहानी सुनोगे? बहुत पुरानी है, पर आज भी सच है।"

श्रवण कुमार की कथा

यह कथा रामायण के अयोध्या कांड में आती है, जहां राजा दशरथ स्वयं इसे याद करते हैं। श्रवण कुमार के माता-पिता दोनों अंधे थे। उन्होंने अपने बेटे से एक ही इच्छा जताई — तीर्थ यात्रा पर जाना है। श्रवण के पास न गाड़ी थी, न पैसे। उसने बांस से एक तराजू जैसा कांवड़ बनाया, दोनों टोकरियों में माता-पिता को बिठाया और कंधे पर उठाकर पैदल यात्रा पर निकल पड़ा।

रास्ते में जब माता-पिता को प्यास लगती, श्रवण दूर-दूर तक पानी ढूंढकर लाता। जब थकते, तो अपने कंधे उन्हें आराम के लिए दे देता। एक बार नदी किनारे पानी भरते समय राजा दशरथ का तीर गलती से उसे लग गया — यह घटना अलग है, पर श्रवण की सेवा-भावना आज भी हर घर में मिसाल की तरह सुनाई जाती है।

रोहन को समझ आई बात

दादी ने कहानी खत्म करके पूछा, "बेटा, श्रवण के पास मोबाइल तो नहीं था, फिर भी माता-पिता को इतना समय कैसे दे पाया?" रोहन थोड़ा शरमा गया। उसे याद आया कि आज सुबह मम्मी ने कुछ बताना चाहा था पर उसने "बाद में" कहकर टाल दिया था।

अगले दिन रोहन ने कुछ बदला। स्कूल से आकर पहले पापा के पास बैठा, उनसे दिनभर की बात पूछी। मम्मी को किचन में हाथ बंटाया। मोबाइल तो चला, पर उतना ही जितना ज़रूरी था — बाकी समय घर वालों के साथ।

सीख: मोबाइल और गैजेट अपनी जगह हैं, पर माता-पिता को थोड़ा समय और सेवा देना — यही सबसे बड़ा तीर्थ है, जैसा श्रवण कुमार ने सदियों पहले करके दिखाया।

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