बच्चों की कहानी: राजा हरिश्चंद्र की सच्चाई और आज के एग्ज़ाम हॉल की परीक्षा
रोहन नौवीं कक्षा में था, और कल गणित का पेपर था। रात को पढ़ते-पढ़ते उसकी आंख लग गई, और सुबह जब वह जागा तो आधा सिलेबस बाकी था। दिल ज़ोर से धड़क रहा था।
कक्षा में वह मौका
एग्ज़ाम हॉल में बगल की सीट पर बैठे विशाल ने इशारा किया — "अपनी कॉपी थोड़ी सी झुका दे, बस दो सवाल देख लूंगा।" रोहन को भी अपने कुछ सवाल याद नहीं आ रहे थे। मन में विचार आया — "थोड़ा देख भी लूं तो क्या फर्क पड़ता है?" ठीक उसी पल उसे अपने दादाजी की सुनाई कहानी याद आ गई।
राजा हरिश्चंद्र की कथा
पौराणिक कथाओं और इतिहास-प्रसंगों में वर्णित है कि अयोध्या के राजा हरिश्चंद्र सत्य के लिए इतने दृढ़ थे कि उन्होंने अपना राज्य, धन, और परिवार तक त्याग दिया, पर सत्य का साथ नहीं छोड़ा। ऋषि विश्वामित्र ने उनकी परीक्षा लेने की ठानी और दान में उनका पूरा राज्य मांग लिया। हरिश्चंद्र ने बिना हिचके राज्य दे दिया, फिर भी दक्षिणा शेष रह गई। उसे चुकाने के लिए उन्होंने अपनी पत्नी तारामती और पुत्र रोहित को बेच दिया, और खुद काशी के श्मशान घाट पर चांडाल का काम करने लगे। इतनी विपत्ति में भी उन्होंने कभी झूठ का सहारा नहीं लिया। अंत में देवता स्वयं प्रसन्न होकर प्रकट हुए, उनका राज्य और परिवार लौटाया, और उन्हें सत्यवादी राजा के रूप में अमर कर दिया।
दादाजी कहते थे — "सच्चाई की राह कठिन ज़रूर होती है, पर वही टिकती है।"
रोहन का फैसला
रोहन ने विशाल से धीरे से कहा, "नहीं यार, जो आता है वही लिखूंगा।" पेपर देते वक्त उसके दो-तीन सवाल छूट गए, दिल में हल्का डर भी रहा। पर जब नतीजा आया, तो उसे अच्छे नंबर मिले थे — अपनी मेहनत के दम पर। और सबसे बड़ी बात, उसने खुद से किया वादा नहीं तोड़ा। विशाल पकड़ा गया और उसकी कॉपी रद्द हुई।
रोहन को समझ आया कि जो जवाब खुद की मेहनत से आता है, वही असली जीत होती है — बाकी सब उधार की खुशी है।
छुट्टी के बाद रोहन ने अपने दोस्तों को यह बात बताई। कुछ ने हंसी उड़ाई कि "इतनी सी बात के लिए नंबर छोड़ दिए," पर रोहन को पता था कि जो उसने पाया वह किसी और का उधार लिया नंबर नहीं था — पूरी तरह उसकी अपनी मेहनत थी। अगली परीक्षा से पहले उसने ठान लिया कि अब सिलेबस आखिरी रात के लिए नहीं टालेगा।
सीख
सच्चाई और मेहनत का रास्ता कठिन लग सकता है, पर वही आगे चलकर सबसे मज़बूत साबित होता है। जो जीत छोटे रास्ते से मिलती है, वह टिकती नहीं — जो मेहनत से मिलती है, वही असली भरोसा देती है।
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