स्वास्थ्य एवं योग: वर्षा ऋतु में पश्चिमोत्तानासन, अनुलोम-विलोम और मूंग दाल की खिचड़ी से रखें सेहत का ख्याल
सावन की झड़ी लगी है, हवा में नमी है और भूख भी पहले जैसी तेज़ नहीं लगती। वर्षा ऋतु (varsha ritu) में शरीर का पाचन-तंत्र स्वाभाविक रूप से थोड़ा कमज़ोर हो जाता है — आयुर्वेद और सनातन दिनचर्या की परंपरा में इस मौसम के लिए अलग खान-पान और अलग योगाभ्यास बताया गया है।
वर्षा ऋतु में दिनचर्या
परंपरा में माना जाता है कि इस मौसम में शरीर की जठराग्नि (पाचन-शक्ति) मंद रहती है, इसलिए भारी और तला-भुना भोजन बोझ बन सकता है। हल्का, गरम और आसानी से पचने वाला सात्विक भोजन इस मौसम के अनुकूल बताया गया है।
आज का योगाभ्यास: पश्चिमोत्तानासन
- पैर सामने सीधे फैलाकर बैठें, रीढ़ सीधी रखें।
- गहरी सांस लेते हुए दोनों हाथ ऊपर उठाएं।
- सांस छोड़ते हुए कमर से आगे झुकें और पैरों के अंगूठे पकड़ने की कोशिश करें, माथा घुटनों की ओर ले जाएं।
- 15-20 सेकंड इसी स्थिति में सहज रहें, फिर धीरे से वापस आएं। शुरुआत में जितना झुकना सहज लगे उतना ही काफी है।
यह आसन पाचन अंगों को हल्का दबाव देकर सक्रिय करता है और रीढ़ को लचीला बनाता है, ऐसा योग-परंपरा में माना जाता है।
आज का प्राणायाम: अनुलोम-विलोम
- पालथी मारकर आराम से बैठें, दायें अंगूठे से दायीं नासिका बंद करें।
- बायीं नासिका से धीरे-धीरे सांस भरें, फिर उंगली से बायीं नासिका बंद कर दायीं से सांस छोड़ें।
- यही क्रम उल्टे क्रम में दोहराएं — 5-7 मिनट तक शांत मन से करें।
यह प्राणायाम मन को शांत रखने और श्वास को संतुलित करने में सहायक माना जाता है।
आज का सात्विक भोजन: मूंग दाल की खिचड़ी
आयुर्वेद के अनुसार माना जाता है कि वर्षा ऋतु में हल्की मूंग दाल की खिचड़ी, थोड़ा घी और अदरक डालकर खाना पाचन के लिए सहज रहता है। साथ में अदरक-तुलसी की चाय या गरम पानी लेना इस मौसम में परंपरागत रूप से बताया जाता है। कच्चे सलाद, ठंडा और बासी भोजन इस मौसम में परंपरा में टालने की सलाह दी जाती है।
क्या ध्यान रखें
- भोजन ताज़ा और गुनगुना ही लें, बहुत ठंडा या बासी न खाएं।
- सुबह-शाम थोड़ी देर टहलना और हल्का योगाभ्यास नियमित रखें।
- बारिश में भीगने के बाद शरीर को अच्छी तरह सुखाकर ही आराम करें, ऐसा परंपरा में सुझाया जाता है।
- यह सामान्य पारंपरिक जीवनशैली मार्गदर्शन है, किसी बीमारी या विशेष स्वास्थ्य समस्या में चिकित्सक की सलाह ही लें।
क्यों जरूरी है यह संतुलन
सनातन परंपरा में ऋतुचर्या को जीवनशैली का आधार माना गया है — यह विचार कि प्रकृति हर मौसम में बदलती है, इसलिए हमारा खान-पान और दिनचर्या भी उसी के अनुरूप ढलनी चाहिए। वर्षा ऋतु में हल्का भोजन, नियमित योगाभ्यास और शांत मन रखने की यह परंपरागत सीख आज भी उतनी ही व्यावहारिक मानी जाती है, जितनी सदियों पहले थी।
योग और सात्विक जीवनशैली से जुड़े और लेख यहां पढ़ें, और मंदिर द्वारा आयोजित योग-सत्रों की जानकारी के लिए कार्यक्रम पेज देखें। नियमित अपडेट के लिए रजिस्ट्रेशन करें।