स्वास्थ्य एवं योग

स्वास्थ्य एवं योग: वर्षा ऋतु में भुजंगासन और अदरक-तुलसी काढ़े से रखें सेहत का ख्याल

सोनी मिश्रा ·

बारिश के इस मौसम में सुबह उठते ही शरीर में हल्कापन कम और भारीपन ज्यादा महसूस होता है। आयुर्वेद में वर्षा ऋतु को "विसर्ग काल" का हिस्सा माना गया है, जहां पाचन अग्नि स्वाभाविक रूप से थोड़ी मंद पड़ जाती है। ऐसे में दिनचर्या में छोटे-छोटे बदलाव बड़ा फर्क ला सकते हैं।

वर्षा ऋतुचर्या: आज का योगाभ्यास

आज सुबह के अभ्यास में भुजंगासन (कोबरा पोज़) को शामिल करें। पेट के बल लेटकर, हाथों की मदद से धीरे-धीरे छाती को ऊपर उठाएं, कंधे ढीले रखें और गहरी सांस लें। परंपरा में माना जाता है कि यह आसन रीढ़ की हड्डी को लचीला रखने के साथ-साथ पाचन अंगों को हल्का दबाव देकर सक्रिय रखने में सहायक है। शुरुआत में इसे 3-4 बार, आराम से और बिना जबरदस्ती के करें। जिन्हें पीठ या कमर में गंभीर तकलीफ हो, वे किसी योग-प्रशिक्षक की सलाह से ही अभ्यास करें।

सात्विक भोजन: आज की सलाह

वर्षा ऋतु में आयुर्वेद के अनुसार माना जाता है कि हल्का, गर्म और ताज़ा बना भोजन सबसे उपयुक्त रहता है। आज के दिन के लिए कुछ सुझाव:

  • सुबह खाली पेट या नाश्ते के बाद अदरक और तुलसी की कुछ पत्तियां डालकर हल्का काढ़ा बनाकर पिएं — परंपरा में इसे मौसम के अनुकूल माना जाता है।
  • ताज़ा पका और गर्म भोजन प्राथमिकता में रखें, बासी या ठंडा भोजन इस मौसम में टालें।
  • कच्चे सलाद या बाहर के तले-भुने खाने की जगह उबली सब्जियां व मूंग दाल की खिचड़ी जैसे हल्के विकल्प चुनें।
  • पानी हमेशा उबालकर, हल्का गुनगुना करके पिएं।

दिनचर्या का एक छोटा नियम

भोजन के बाद कम से कम 10-15 मिनट टहलना या वज्रासन में बैठना पाचन में सहायक माना जाता है। यह किसी चिकित्सकीय उपचार का विकल्प नहीं है, बल्कि परंपरा से चली आ रही जीवनशैली की एक सरल आदत है। यदि कोई स्वास्थ्य समस्या हो तो चिकित्सक से सलाह लेना ही उचित है।

नमी और मच्छरों से बचाव

बरसात में नमी बढ़ने से कीट-मच्छर भी बढ़ते हैं। परंपरा में घर के आसपास पानी जमा न होने देने, तुलसी व नीम के पौधे लगाने और शाम को दरवाजे-खिड़कियां समय पर बंद रखने की सलाह दी जाती रही है। ये छोटी आदतें मौसमी बीमारियों से बचाव में सहायक मानी जाती हैं।

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