स्वास्थ्य एवं योग

स्वास्थ्य एवं योग: वर्षा ऋतु में शलभासन, अनुलोम-विलोम और मूंग दाल की खिचड़ी से रखें सेहत का ख्याल

सोनी मिश्रा ·

बारिश के मौसम में शरीर की जठराग्नि यानी पाचन-शक्ति स्वाभाविक रूप से कमजोर पड़ जाती है। आयुर्वेद की ऋतुचर्या (मौसम के अनुसार दिनचर्या) की परंपरा में वर्षा ऋतु के लिए खास सलाह दी गई है, ताकि शरीर मौसम के बदलाव के साथ संतुलन बनाए रखे।

इस मौसम में वातावरण की नमी और बदलते तापमान के कारण शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता पर भी असर पड़ता है। यही कारण है कि दिनचर्या और आहार में थोड़ी सजगता रखने की परंपरा रही है — न बहुत ज़्यादा परिश्रम, न बहुत आलस्य, बल्कि संतुलित नियमितता।

आज का आसन — शलभासन

पेट के बल लेटकर हाथ-पैर ऊपर उठाने वाला शलभासन (टिड्डी मुद्रा) रीढ़ और पाचन अंगों को सक्रिय करता है। इसे सुबह खाली पेट, आराम से 15-20 सेकंड के तीन चक्रों में करने की परंपरा मानी जाती है। जिन्हें कमर या रीढ़ की कोई समस्या हो, वे किसी योग शिक्षक की सलाह से ही अभ्यास करें।

आज का प्राणायाम — अनुलोम-विलोम

एक नथुने से सांस लेकर दूसरे से छोड़ने वाला अनुलोम-विलोम प्राणायाम मन को शांत करने और श्वास-तंत्र को संतुलित रखने के लिए परंपरा में बहुत उपयोगी माना गया है। रोज़ 5-7 मिनट, शांत मन से इसका अभ्यास करने की सलाह दी जाती है।

आज का आहार — सात्विक और हल्का भोजन

वर्षा ऋतु में आयुर्वेद के अनुसार हल्का, गर्म और आसानी से पचने वाला भोजन उपयुक्त माना जाता है। मूंग दाल की खिचड़ी, थोड़ा घी और हल्के मसाले (जीरा, हींग, अदरक) इस मौसम के लिए परंपरा में उपयुक्त बताए गए हैं। भोजन में हरी पत्तेदार सब्ज़ियों की जगह इस मौसम में लौकी, तोरई जैसी हल्की सब्ज़ियां परंपरा में अधिक उपयुक्त मानी जाती हैं, क्योंकि बारिश के मौसम में पत्तेदार सब्ज़ियों में कीटाणु पनपने की आशंका ज़्यादा रहती है।

क्या अपनाएं

  • भोजन ताज़ा और गुनगुना खाएं, बासी या ठंडा भोजन इस मौसम में टालें।
  • पानी उबालकर, हल्का गुनगुना पीने की परंपरा मानी जाती है।
  • सुबह का समय योग और प्राणायाम के लिए नियमित रखें।

क्या टालें

  • बरसात के पानी में भीगे या सड़क किनारे के तले-भुने खाने से परहेज़ करने की सलाह दी जाती है।
  • भारी, तैलीय और देर से पचने वाला भोजन इस मौसम में कम करें।
  • बिना गर्म किए कच्चा या ठंडा पानी पीने से बचें।

छोटे-छोटे नियमों का पालन करके इस मौसम में भी शरीर को स्वस्थ और मन को स्थिर रखा जा सकता है। नियमित योग, हल्का भोजन और समय पर सोना-जागना — यही वर्षा ऋतु की सबसे सरल आयुर्वेदिक सलाह मानी जाती है।

ध्यान रहे — यह सामान्य पारंपरिक जानकारी है, चिकित्सीय सलाह नहीं; किसी भी स्वास्थ्य समस्या में चिकित्सक से परामर्श लें। योग और सेहत से जुड़े और लेखों के लिए अन्य लेख देखें, और मंदिर के कार्यक्रम से जुड़ें।

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