भजनावली

हनुमान चालीसा: गोस्वामी तुलसीदास की अमर रचना का भावार्थ

आनंद दुबे ·

शनिवार का दिन उत्तर भारत में परंपरागत रूप से हनुमान जी के स्मरण से जुड़ा माना जाता है। इसी दिन के लिए आज हम लेकर आए हैं गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित हनुमान चालीसा की कुछ प्रमुख चौपाइयां, उनका सरल अर्थ और इस रचना की परंपरा।

रचनाकार और परंपरा

हनुमान चालीसा की रचना 16वीं शताब्दी में गोस्वामी तुलसीदास ने अवधी भाषा में की थी। यह चालीस चौपाइयों (इसीलिए नाम 'चालीसा') की एक स्तुति है, जिसमें हनुमान जी के गुण, बल, भक्ति और सेवा भाव का वर्णन है। सदियों से यह भारत के हर कोने में घर-घर में गाई जाती रही है।

मूल पाठ की कुछ चौपाइयां

दोहा:
श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि।
बरनउं रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि॥

भावार्थ: गुरु के चरण-कमलों की धूल से अपने मन रूपी दर्पण को शुद्ध करके, मैं श्री रघुनाथ जी के निर्मल यश का वर्णन करता हूं, जो धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष चारों फल देने वाला है।

चौपाई:
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर।
जय कपीस तिहुं लोक उजागर॥

भावार्थ: हे हनुमान जी, आप ज्ञान और गुणों के सागर हैं। हे वानरराज, आपकी कीर्ति तीनों लोकों में फैली हुई है।

चौपाई:
बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार।
बल बुधि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेश बिकार॥

भावार्थ: अपने आप को बुद्धिहीन समझकर मैं पवनपुत्र हनुमान का स्मरण करता हूं। हे प्रभु, मुझे बल, बुद्धि और विद्या दीजिए तथा मेरे दुख और विकार दूर कीजिए।

चौपाई:
संकट कटे मिटे सब पीरा।
जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥

भावार्थ: जो कोई बलवीर हनुमान जी का स्मरण करता है, उसके सारे संकट कट जाते हैं और सभी पीड़ाएं मिट जाती हैं — ऐसा परंपरा में माना जाता है।

इस पाठ का भाव

हनुमान चालीसा केवल स्तुति नहीं, बल्कि सेवा, समर्पण और निर्भयता का संदेश भी है। परंपरा में माना जाता है कि नियमित रूप से इसका पाठ करने से मन में स्थिरता और साहस का भाव बढ़ता है। यह किसी चमत्कार का दावा नहीं बल्कि श्रद्धा और आत्मबल बढ़ाने की एक सहज विधि मानी जाती है।

घर पर कैसे करें

  • शनिवार या मंगलवार की शाम दीपक जलाकर पाठ करना परंपरा में शुभ माना जाता है।
  • स्वर की शुद्धता से अधिक जरूरी है भाव और श्रद्धा से पाठ करना।
  • बच्चों को भी सरल भावार्थ सहित यह पाठ सिखाया जा सकता है, ताकि वे अर्थ समझकर गाएं।

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