बच्चों की कहानी: ध्रुव का अटल संकल्प — जब क्रिकेट टीम में जगह न मिले तो हार मत मानो
अर्णव स्कूल की क्रिकेट टीम की सिलेक्शन लिस्ट देखकर एक कोने में खड़ा रह गया। उसका नाम नहीं था। कैप्टन ने कहा, "तू अभी बहुत छोटा है, अगले साल देख लेंगे।" अर्णव की आंखों में आंसू आ गए। ठीक वैसे ही, जैसे हज़ारों साल पहले एक बच्चे के साथ हुआ था — उसका नाम था ध्रुव।
ध्रुव की कथा — श्रीमद्भागवत पुराण से
श्रीमद्भागवत पुराण में कथा है कि राजा उत्तानपाद के दो रानियां थीं — सुनीति और सुरुचि। एक दिन छोटा ध्रुव अपने पिता की गोद में बैठना चाहता था, पर सौतेली मां सुरुचि ने उसे रोक दिया और कहा कि यह जगह केवल उसी के बेटे के लिए है, जो उसकी कोख से जन्मा हो। ध्रुव को बहुत बुरा लगा। वह रोता हुआ अपनी मां के पास गया।
मां सुनीति ने उसे समझाया कि दुख से हारना नहीं, बल्कि परिश्रम से आगे बढ़ना ही सही राह है। छोटा ध्रुव जंगल गया और घोर तप किया। उसकी लगन देखकर भगवान विष्णु प्रसन्न हुए और उसे आकाश में एक अटल स्थान दिया — आज भी उसे ध्रुव तारा कहा जाता है, जो कभी अपनी जगह से नहीं हिलता।
अर्णव की कहानी आगे बढ़ती है
अर्णव ने भी वैसा ही किया। उसने हार मानने की बजाय रोज़ सुबह गली में अकेले बॉलिंग और बैटिंग की प्रैक्टिस शुरू कर दी। बारिश हो या धूप, वह नहीं रुका। कुछ महीनों बाद स्कूल में एक और सिलेक्शन हुआ, और इस बार कोच ने खुद कहा, "इस लड़के में कुछ खास बात है — इसकी मेहनत दिखती है।" अर्णव का नाम टीम में आ गया।
सीख
ध्रुव और अर्णव की कहानी एक ही बात कहती है — जब कोई दरवाज़ा बंद हो, तो मेहनत और लगन से खुद अपनी जगह बनाई जा सकती है, ठीक ध्रुव तारे जितनी अटल।
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