बच्चों के लिए कहानियाँ

बच्चों की कहानी: ध्रुव जैसा हौसला — जब टीम से नाम कट गया

आनंद दुबे ·

अर्णव का नाम स्कूल की क्रिकेट टीम की लिस्ट में नहीं था। वह नोटिस बोर्ड के सामने खड़ा तीन बार लिस्ट पढ़ चुका था, हर बार उम्मीद थी कि नाम कहीं छूट गया होगा। पर नहीं था। कोच ने कंधे पर हाथ रखकर बस इतना कहा, "अगली बार बेहतर खेलना, अर्णव।"

घर आकर अर्णव सीधे अपने कमरे में चला गया, मोबाइल भी साइड में रख दिया। दादी ने उसे उदास देखा तो पास बिठाकर एक पुरानी कहानी सुनानी शुरू की — भागवत पुराण की, राजकुमार ध्रुव की कहानी।

ध्रुव की कहानी

दादी ने बताया — बहुत समय पहले राजा उत्तानपाद की दो रानियाँ थीं। छोटी रानी सुरुचि का बेटा उत्तम एक दिन पिता की गोद में जा बैठा। बड़ी रानी सुनीति का बेटा ध्रुव भी दौड़कर पिता की गोद में बैठना चाहता था, पर सुरुचि ने उसे रोक दिया और कहा कि गोद में बैठने का अधिकार सिर्फ उसके अपने बेटे को है, क्योंकि वही राजा की प्रिय रानी की संतान है।

छोटा ध्रुव रोता हुआ माँ के पास गया। माँ सुनीति ने उसे गले लगाया और समझाया — "बेटा, जो सम्मान माँगने से नहीं मिलता, वह अपने परिश्रम और संकल्प से कमाया जाता है। हार मत मानो, स्वयं को इतना समर्थ बनाओ कि कोई तुम्हें रोक न सके।"

छोटा सा ध्रुव यह बात गाँठ बाँधकर जंगल की ओर चल पड़ा। वहाँ वर्षों तक धैर्य, अभ्यास और लगन से उसने खुद को साधा। उसका संकल्प इतना दृढ़ था कि आज भी आकाश में जो तारा हमेशा एक ही जगह, बिना डिगे चमकता है, वह "ध्रुव तारा" उसी बालक ध्रुव के नाम पर जाना जाता है — अटल और स्थिर बने रहने का प्रतीक।

अर्णव की सीख

दादी ने कहानी खत्म करके पूछा, "तो अब क्या करोगे, बेटा?" अर्णव थोड़ी देर चुप रहा, फिर मुस्कुराया। अगले दिन शाम से वह मोहल्ले के मैदान में अकेले प्रैक्टिस करने लगा — बैटिंग, फील्डिंग, दौड़। कोई महँगा कोच नहीं था, बस मोबाइल पर वीडियो देखकर खुद अभ्यास करता, रोज़ थोड़ा-थोड़ा बेहतर होता गया। दो महीने बाद जब टीम का दोबारा ट्रायल हुआ, कोच हैरान होकर बोले — "तुम तो बहुत बदल गए हो, अर्णव!"

सीख: जो चीज़ माँगने या शिकायत करने से नहीं मिलती, वह निरंतर मेहनत और धैर्य से ज़रूर मिलती है।

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