बच्चों के लिए कहानियाँ

बच्चों की कहानी: नचिकेता का साहस — जब परीक्षा का डर सबसे बड़ा दुश्मन बन जाए

आनंद दुबे ·

बोर्ड परीक्षा का रिज़ल्ट आने में बस तीन दिन बचे थे। रोहन रात-रात भर जागकर सोचता रहता — "अगर नंबर कम आए तो? अगर फेल हो गया तो?" डर इतना बड़ा हो गया था कि उसने किताब छूना ही बंद कर दिया था। तभी दादाजी ने उसे एक कहानी सुनाई — कठोपनिषद की, नचिकेता की कहानी।

नचिकेता की कहानी

बहुत समय पहले, ऋषि वाजश्रवा ने एक यज्ञ में अपनी सारी गायें दान करने का संकल्प लिया। पर उनकी दी गई गायें बूढ़ी और कमज़ोर थीं। उनके छोटे बेटे नचिकेता को यह अनुचित लगा। उसने पूछा, "पिताजी, आप मुझे किसे दान करेंगे?" पिता ने गुस्से में कह दिया, "तुझे मैं यमराज को दान करता हूं!"

नचिकेता डरा नहीं। उसने पिता की बात को सच माना और सीधा यमलोक पहुंच गया। यमराज उस समय वहां नहीं थे, इसलिए नचिकेता तीन दिन तक द्वार पर भूखा-प्यासा प्रतीक्षा करता रहा। जब यमराज लौटे, तो एक बालक की यह दृढ़ता देखकर प्रभावित हुए और तीन वरदान मांगने को कहा।

पहले दो वरदानों में नचिकेता ने अपने पिता की शांति और यज्ञ-विद्या मांगी। पर तीसरे वरदान में उसने वह सवाल पूछा जिससे बड़े-बड़े ज्ञानी भी बचते हैं — "मृत्यु के बाद क्या होता है, यह सच-सच बताइए।"

यमराज ने पहले उसे धन, राज्य, सुंदर स्त्रियां और लंबी उम्र का लालच देकर टालने की कोशिश की। पर नचिकेता ने साफ कहा, "यह सब नाशवान है। मुझे तो वही सत्य चाहिए जो आपने कहने से रोका है।" उसके साहस और सच्ची जिज्ञासा से प्रसन्न होकर यमराज ने उसे आत्मा के अमरत्व का गूढ़ ज्ञान दिया।

आज रोहन के लिए इसका मतलब

दादाजी ने समझाया — "नचिकेता मौत के द्वार पर भी नहीं घबराया, क्योंकि उसने डर की जगह सच्चाई का सामना करना चुना। तुम्हारा डर तो सिर्फ एक रिज़ल्ट है, बेटा। जो पढ़ा है वह मेहनत तुम्हारे साथ है, नंबर कुछ भी आएं।"

रोहन को समझ आया कि डर से भागने के बजाय उसका सामना करना ही असली हिम्मत है। उसने फिर से किताबें खोलीं — इस बार रिज़ल्ट की चिंता से नहीं, बल्कि बचे हुए दिनों को ठीक से इस्तेमाल करने के इरादे से।

सीख

जो डर का सामना सच्चाई और हिम्मत से करता है, वही असली ज्ञान और शांति पाता है।

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