बच्चों की कहानी: श्रवण कुमार की मातृ-पितृ भक्ति — जब पढ़ाई के बहाने माता-पिता को भूल जाएं
रोहन नौवीं कक्षा में था और परीक्षा नज़दीक थी। हर शाम वह अपने कमरे में मोबाइल पर ऑनलाइन क्लास लगाकर बैठ जाता। मम्मी जब चाय लेकर आतीं तो वह "बाद में मम्मी, अभी पढ़ रहा हूँ" कहकर टाल देता। धीरे-धीरे उसने पापा के साथ शाम की सैर पर जाना भी बंद कर दिया — "टाइम नहीं है" कहकर।
एक दिन दादी ने उसे पास बिठाकर एक पुरानी कहानी सुनाई — वाल्मीकि रामायण की, श्रवण कुमार की कथा। दादी ने कहा, "यह कथा हज़ारों साल पुरानी है, पर आज भी उतनी ही सच्ची लगती है, ज़रा ध्यान से सुनो।"
कथा क्या है
श्रवण कुमार के माता-पिता अंधे थे। उन्होंने तीर्थयात्रा की इच्छा जताई तो श्रवण ने कंधे पर कांवड़ में बिठाकर उन्हें पूरे रास्ते खुद पैदल घुमाया। रास्ते में एक रात श्रवण नदी से पानी भरने गया, तभी अंधेरे में शिकार खेल रहे राजा दशरथ का तीर गलती से उसे लग गया। मरते हुए भी श्रवण को अपनी नहीं, अपने अंधे माता-पिता की चिंता थी — कि अब उन्हें पानी कौन देगा, आगे कौन ले जाएगा। राजा दशरथ स्वयं श्रवण के माता-पिता के पास गए और उन्हें यह दुखद समाचार सुनाया।
आज के रोहन जैसा सवाल
दादी ने पूछा — "क्या श्रवण के पास वक्त की कमी नहीं थी? फिर भी उसने माता-पिता को कभी पीछे नहीं छोड़ा।" रोहन को समझ आया कि पढ़ाई ज़रूरी है, पर इसका मतलब यह नहीं कि माता-पिता के साथ बैठने का, उनकी बात सुनने का समय बिलकुल न निकाला जाए। बस पाँच-दस मिनट भी सच्चे मन से साथ बिताना काफी होता है।
अगले दिन से रोहन ने एक नया नियम बनाया — पढ़ाई के बीच एक छोटा ब्रेक मम्मी-पापा के साथ चाय पर बातचीत के लिए, और हफ्ते में दो शाम पापा के साथ टहलने के लिए तय कर लीं। शुरू में उसे लगा कि इससे पढ़ाई का समय कम हो जाएगा, पर उल्टा हुआ — मन हल्का रहने से पढ़ाई में भी ध्यान पहले से ज़्यादा लगने लगा। परीक्षा की तैयारी भी चलती रही, और घर का रिश्ता भी मज़बूत होता गया।
सीख
जितना ज़रूरी अपना लक्ष्य है, उतना ही ज़रूरी उन लोगों के लिए थोड़ा वक्त निकालना है जिन्होंने हमें यहाँ तक पहुँचाया — व्यस्तता कभी भी माता-पिता की उपेक्षा का बहाना नहीं बननी चाहिए। श्रवण कुमार की कथा हमें यही सिखाती है कि सच्चा प्रेम बड़े-बड़े कामों में नहीं, रोज़ के छोटे ध्यान में दिखता है।
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