भागवत कथा: गजेंद्र मोक्ष — जब बल से नहीं, समर्पण से मिलती है रक्षा
एक हाथी, एक मगरमच्छ, और एक झील — यह कथा श्रीमद्भागवत के आठवें स्कंध में आती है, और यह हमें सिखाती है कि सच्ची शरणागति के आगे बल और ताकत मायने नहीं रखते।
कथा — गजेंद्र मोक्ष
त्रिकूट पर्वत पर गजेंद्र नाम का एक विशालकाय, बलशाली हाथी अपने परिवार के साथ रहता था। एक दिन वह झील में जल पीने और स्नान करने उतरा। तभी एक मगरमच्छ ने उसका पैर जकड़ लिया। गजेंद्र ने अपनी पूरी शक्ति लगाकर खुद को छुड़ाने की कोशिश की, वर्षों तक संघर्ष चला, लेकिन मगरमच्छ की पकड़ नहीं छूटी। धीरे-धीरे उसकी सारी शारीरिक शक्ति चुक गई।
जब बल और साथी हाथी भी उसे नहीं बचा सके, तब गजेंद्र ने अपने मन को पूरी तरह भगवान विष्णु की शरण में समर्पित कर दिया और व्याकुल हृदय से उन्हें पुकारा।
श्लोक और उसका भावार्थ
"तं तथा कृपणं दृष्ट्वा भगवान् भक्तवत्सलः।
तत्रैवाशु गतो राजन् गरुडेन यथारुणा॥"
(श्रीमद्भागवत, स्कंध 8, अध्याय 3)
अर्थ — गजेंद्र को इस तरह असहाय देखकर, भक्तों पर स्नेह रखने वाले भगवान विष्णु उसी क्षण गरुड़ पर सवार होकर वहां पहुंच गए, जैसे सूर्य की किरण तुरंत पहुंचती है।
भगवान ने बिना पल गंवाए अपने चक्र से मगरमच्छ का वध किया और गजेंद्र को बचा लिया।
इस कथा से क्या सीखें
गजेंद्र एक बलशाली हाथी था, फिर भी संकट की घड़ी में उसका बल काम नहीं आया। जब उसने अहंकार छोड़कर पूरी तरह समर्पण किया, तभी सहायता मिली। शास्त्र कहते हैं कि सच्ची भक्ति और निश्छल शरणागति में यह शक्ति होती है कि वह हर बाधा से पार लगा देती है — चाहे संकट कितना भी बड़ा क्यों न हो।
ऐसी ही और भागवत कथाओं और सद्ग्रंथों की जानकारी के लिए हमारा ब्लॉग देखें, और मंदिर के सत्संग कार्यक्रम से जुड़ने के लिए रजिस्ट्रेशन करें।