भागवत कथा

भागवत कथा: सृष्टि के आरंभ का मंगलाचरण — श्रीमद्भागवत का पहला श्लोक

मनोज तिवारी ·

हर बड़े काम की शुरुआत में हम भगवान का स्मरण करते हैं — नई नौकरी हो, नया घर हो या बच्चे की परीक्षा। यही परंपरा हज़ारों साल पहले महर्षि वेदव्यास ने श्रीमद्भागवत पुराण के आरंभ में निभाई थी।

पहला श्लोक

"जन्माद्यस्य यतोऽन्वयादितरतश्चार्थेष्वभिज्ञः स्वराट्
तेने ब्रह्म हृदा य आदिकवये मुह्यन्ति यत्सूरयः।
तेजोवारिमृदां यथा विनिमयो यत्र त्रिसर्गोऽमृषा
धाम्ना स्वेन सदा निरस्तकुहकं सत्यं परं धीमहि॥"

(श्रीमद्भागवत महापुराण, प्रथम स्कंध, प्रथम अध्याय, श्लोक 1)

अर्थात— हम उस परम सत्य का ध्यान करते हैं, जिससे इस सृष्टि की रचना, पालन और लय होता है, जो स्वयं पूर्ण ज्ञानी है, जिसने आदिकवि ब्रह्मा के हृदय में वेदज्ञान प्रकट किया, जिसे बड़े-बड़े ज्ञानी भी पूरी तरह नहीं जान पाते, और जिसकी सृष्टि उसी तरह सच्ची है जैसे मिट्टी से बने बर्तन में मिट्टी सच होती है — वह स्वयं अपने तेज से सदा भ्रम को दूर करने वाला है।

कथा-प्रसंग

यह श्लोक कोई साधारण शुरुआत नहीं है। नैमिषारण्य में जब शौनक आदि ऋषियों ने सूत जी से पूछा कि मनुष्य के जीवन का सबसे बड़ा कल्याण किस मार्ग से होगा, तो सूत जी ने यही उत्तर दिया — पहले उस परम सत्य को नमन करो जिससे यह सारा जगत उपजा है, तभी आगे की कथा सार्थक होगी। वेदव्यास जी ने अठारह पुराणों का सार निकालकर यही भागवत रचा, ताकि साधारण मनुष्य भी सरल कथाओं के माध्यम से गहरे सत्य तक पहुँच सके।

आज के जीवन के लिए सीख

इस श्लोक की सीख सीधी है — दिन की शुरुआत जब स्मरण और कृतज्ञता से हो, तो मन उलझनों में भी स्थिर रहता है। सुबह उठते ही दो पल भगवान का नाम लेना, या मंदिर की ओर मन से प्रणाम करना, इसी परंपरा का हिस्सा है।

भागवत कथा और सत्संग से जुड़े कार्यक्रम की जानकारी के लिए वेबसाइट देखें, और पास के मंदिर में दर्शन का लाभ उठाएँ।

इस श्रेणी में और लेख

भागवत कथा: सबसे बड़ा धर्म क्या है — श्रीमद्भागवत का एक मार्गदर्शक श्लोक → भागवत कथा: श्रवण-कीर्तन-स्मरण से मिलता है अभय — शुकदेव जी की शिक्षा → भागवत कथा: भक्ति ही मनुष्य का परम धर्म है →
💬