भागवत कथा

भागवत कथा: भक्ति ही मनुष्य का परम धर्म है

मनोज तिवारी ·

नैमिषारण्य के जंगल में एक बार ऋषियों ने बारह वर्षों तक चलने वाला एक बड़ा सत्संग-यज्ञ रचा। वहां सूत जी से महर्षि शौनक ने पूछा — "हे सूत जी, संसार में मनुष्य के लिए सबसे बड़ा कल्याण किस बात में है? वह कौन सा धर्म है जो हर हाल में मनुष्य का भला करे?" इसी प्रश्न के उत्तर में श्रीमद्भागवत महापुराण का यह प्रसिद्ध श्लोक कहा गया —

"स वै पुंसां परो धर्मो यतो भक्तिरधोक्षजे।
अहैतुक्यप्रतिहता ययात्मा सुप्रसीदति॥"

(श्रीमद्भागवत, प्रथम स्कन्ध, द्वितीय अध्याय, श्लोक ६)

भावार्थ

अर्थात् — मनुष्य के लिए सबसे बड़ा धर्म वही है जिससे भगवान (जो इंद्रियों की पकड़ से परे हैं) के प्रति भक्ति जागृत हो। और वह भक्ति भी कैसी होनी चाहिए — अहैतुकी, यानी बिना किसी स्वार्थ या बदले की इच्छा के, और अप्रतिहता, यानी किसी भी परिस्थिति से बाधित न होने वाली। ऐसी निश्छल भक्ति से ही मनुष्य का मन और आत्मा सच्चे अर्थों में संतुष्ट और शांत होते हैं।

यह श्लोक हमें सिखाता है कि पूजा-पाठ, कर्मकांड और नियम सभी सहायक साधन हैं, पर उनका असली लक्ष्य मन में निःस्वार्थ भाव और भगवान के प्रति सच्चा प्रेम जगाना है। जब भक्ति किसी लाभ की उम्मीद के बिना, केवल प्रेमवश की जाती है, तभी वह सच्चे अर्थों में फलदायी मानी गई है।

रोज़मर्रा के जीवन में इसका सीधा अर्थ यह है कि हम अपने कर्तव्य, पूजा-पाठ और रिश्तों को भी बिना स्वार्थ के निभाने का प्रयास करें — यही भाव धीरे-धीरे मन को शांति की ओर ले जाता है। यह केवल एक दार्शनिक विचार नहीं, बल्कि रोज़ के जीवन में उतारने योग्य एक सरल दृष्टिकोण है।

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