सद्ग्रंथ

सद्ग्रंथ: कठोपनिषद का परिचय — श्रेय और प्रेय के बीच का फ़र्क़

प्रेमचंद्र दुबे ·

अक्सर ज़िंदगी में दो रास्ते सामने होते हैं — एक जो अभी अच्छा लगे, दूसरा जो असल में भला हो। यही सवाल हज़ारों साल पहले एक बालक ने साक्षात मृत्यु के देवता से पूछा था। यह कथा कठोपनिषद में मिलती है।

नचिकेता की कथा

ऋषि वाजश्रवा ने एक यज्ञ में अपना सब कुछ दान करने का संकल्प लिया, पर दान में दुर्बल और बूढ़ी गायें देने लगे। उनके छोटे बेटे नचिकेता को यह उचित न लगा। उसने पिता से पूछा, "मुझे किसे दान करेंगे?" पिता ने चिढ़कर कह दिया, "तुझे मैं यमराज को देता हूँ।" पिता का वचन सच करने के लिए नचिकेता यमलोक चला गया।

यमराज उस समय घर पर नहीं थे। तीन दिन तक नचिकेता द्वार पर बिना अन्न-जल के प्रतीक्षा करता रहा। लौटने पर यमराज ने इस प्रतीक्षा के बदले तीन वर माँगने को कहा। पहले दो वर सामान्य थे, पर तीसरे वर में नचिकेता ने पूछा — "मृत्यु के बाद आत्मा का क्या होता है?"

श्रेय और प्रेय का उपदेश

यमराज ने पहले नचिकेता को धन, राज्य और भोग-विलास का लालच देकर परखा, पर बालक टस से मस न हुआ। तब प्रसन्न होकर यमराज ने वह प्रसिद्ध उपदेश दिया जो कठोपनिषद का सार है — जीवन में एक ओर "श्रेय" है यानी वह जो अंततः भला करे, और दूसरी ओर "प्रेय" है यानी वह जो तुरंत सुख दे। बुद्धिमान मनुष्य श्रेय को चुनता है, जबकि अज्ञानी क्षणिक सुख यानी प्रेय के पीछे भागता है।

इसी उपनिषद में आत्मा को रथ के स्वामी और शरीर को रथ, बुद्धि को सारथी तथा मन को लगाम बताया गया है — यह "रथ-रूपक" आत्म-संयम को समझाने का बेहद सरल और सुंदर तरीका माना जाता है।

आज के लिए मनन

मोबाइल पर एक और वीडियो देखना (प्रेय) या समय पर सोकर कल की तैयारी करना (श्रेय) — यह चुनाव आज भी हर घर में रोज़ होता है। कठोपनिषद की यह सीख आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। यह लेख ग्रंथ का एक सरल परिचय है, इसे धार्मिक निर्णय का आधार बनाने के बजाय चिंतन के रूप में देखें।

ऐसे ही ग्रंथों पर आधारित लेख पढ़ने के लिए ब्लॉग देखें, और सत्संग कार्यक्रम की जानकारी वेबसाइट पर पाएँ।

इस श्रेणी में और लेख

सद्ग्रंथ: श्रीमद्भगवद्गीता का परिचय — महाभारत के युद्धक्षेत्र से निकला जीवन-दर्शन → सद्ग्रंथ: नारद भक्ति सूत्र का परिचय — भक्ति की सरल परिभाषा → सद्ग्रंथ: ईशावास्य उपनिषद का पहला मंत्र — त्याग भाव से जीवन जीने की सीख →
💬