सद्ग्रंथ

सद्ग्रंथ: ईशावास्य उपनिषद का पहला मंत्र — त्याग भाव से जीवन जीने की सीख

प्रेमचंद्र दुबे ·

उपनिषदों में सबसे छोटा पर बेहद गहरा माना जाने वाला ग्रंथ है — ईशावास्य उपनिषद। शुक्ल यजुर्वेद के अंत में स्थित यह उपनिषद मात्र अठारह मंत्रों का है, पर इसका पहला ही मंत्र जीवन जीने की पूरी दिशा दे देता है।

मंत्र

"ईशा वास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्॥"

भावार्थ

अर्थात् — इस जगत में जो कुछ भी दिखाई देता है, वह सब ईश्वर से व्याप्त है, ईश्वर का ही निवास है। इसलिए त्याग भाव से — यानी बिना आसक्ति और अहंकार के — इसका उपभोग करना चाहिए। किसी और के धन या वस्तु के प्रति लालच नहीं रखना चाहिए।

यह मंत्र संसार को त्यागने के लिए नहीं कहता, बल्कि संसार में रहते हुए भी सही दृष्टिकोण अपनाने की सीख देता है। घर, परिवार, धन, संपत्ति — यह सब हमारे पास एक अमानत की तरह है, स्थायी स्वामित्व की तरह नहीं। जब यह भाव मन में बैठ जाता है, तो न तो पाने की अंधी दौड़ रहती है और न खोने का भय।

आज के समय में जब चारों ओर अधिक पाने की होड़ दिखती है, यह प्राचीन मंत्र एक संतुलित जीवन जीने की राह दिखाता है — जरूरत भर भोग करें, संतोष रखें, और दूसरों के हिस्से पर नज़र न रखें। यही भाव पारिवारिक शांति और मानसिक संतुलन दोनों का आधार बनता है।

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