गुरु पूर्णिमा 2026: महर्षि वेदव्यास की कथा — क्यों कहलाती है व्यास पूर्णिमा (भाग 2 — कथा)
गुरु पूर्णिमा का पर्व निकट है, और इसे व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है। आख़िर यह नाम क्यों पड़ा? इसके पीछे एक बहुत पुरानी और प्रेरक कथा है — महर्षि वेदव्यास की कथा।
महर्षि पराशर और सत्यवती के पुत्र
कथा के अनुसार, महर्षि पराशर और माता सत्यवती के पुत्र के रूप में एक दिव्य बालक का जन्म हुआ, जिनका नाम पड़ा कृष्ण द्वैपायन — क्योंकि उनका वर्ण श्याम था और जन्म यमुना के एक द्वीप पर हुआ था। यही बालक आगे चलकर महर्षि वेदव्यास कहलाए।
वेदों का विभाजन — क्यों बने "व्यास"
प्राचीन काल में वेद एक ही विशाल ज्ञान-राशि के रूप में थे, जिन्हें कंठस्थ रखना व समझना अत्यंत कठिन था। महर्षि वेदव्यास ने मानव-कल्याण के लिए इस विशाल ज्ञान को चार भागों — ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद — में विभक्त किया। "व्यास" शब्द का अर्थ ही होता है "विभाजन करने वाला"। इसी कार्य के कारण उन्हें वेदव्यास कहा गया।
महाभारत, पुराण और ब्रह्मसूत्र के रचयिता
महर्षि वेदव्यास केवल वेदों के विभाजनकर्ता ही नहीं थे। परंपरा में माना जाता है कि उन्होंने अठारह पुराणों की रचना की, महाभारत जैसे महाकाव्य की रचना की, और वेदांत दर्शन के आधारभूत ग्रंथ ब्रह्मसूत्र की भी रचना की। इतने विशाल ज्ञान-भंडार को जन-जन तक पहुँचाने के कारण उन्हें समस्त सनातन परंपरा में आदि-गुरु के समान सम्मान प्राप्त है।
इसीलिए मनाई जाती है व्यास पूर्णिमा
शास्त्रों में माना जाता है कि आषाढ़ माह की पूर्णिमा को ही महर्षि वेदव्यास का प्राकट्य हुआ था। इसीलिए इस तिथि को उनके सम्मान में "व्यास पूर्णिमा" कहा गया, और चूँकि वे स्वयं सृष्टि के आदि-गुरु माने जाते हैं, यही दिन आगे चलकर "गुरु पूर्णिमा" के रूप में समस्त गुरु-शिष्य परंपरा के सम्मान का पर्व बन गया।
इस कथा से एक सीख मिलती है — ज्ञान चाहे कितना भी विशाल क्यों न हो, जब वह सरल और सुलभ रूप में बाँटा जाता है, तभी वह सच्चे अर्थों में जन-कल्याणकारी बनता है। यही महर्षि वेदव्यास का जीवन-संदेश है।
गुरु-शिष्य परंपरा से जुड़ाव
महर्षि वेदव्यास को केवल एक रचयिता के रूप में नहीं, बल्कि उस परंपरा के आरंभकर्ता के रूप में देखा जाता है जिसमें ज्ञान गुरु से शिष्य तक मौखिक रूप से, आदर और श्रद्धा के साथ हस्तांतरित होता है। उन्होंने स्वयं अपने शिष्यों — पैल, वैशम्पायन, जैमिनि, सुमन्तु और अपने पुत्र शुकदेव — को अलग-अलग वेदों व पुराणों की शिक्षा दी। यही कारण है कि गुरु पूर्णिमा के दिन शिष्य अपने गुरु के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं, चाहे वह गुरु कोई शिक्षक हों, कोई मार्गदर्शक हों, या जीवन में सही राह दिखाने वाला कोई भी व्यक्ति।
गुरु पूर्णिमा शृंखला की अगली कड़ी में हम जानेंगे कि घर में इस पावन दिन की तैयारी कैसे की जाती है। तब तक हमारे अन्य लेख पढ़ें और मंदिर के आगामी कार्यक्रम देखें। पाँचों मंदिरों से जुड़ने के लिए साइट पर रजिस्ट्रेशन करें।