दैनिक ज्ञान

दैनिक ज्ञान: ईशावास्य उपनिषद की सीख — त्याग कर भोगो, दूसरे के धन का लोभ मत करो

प्रेमचंद्र दुबे ·

सावन का महीना चल रहा है और घर-घर में भक्ति का माहौल है। ऐसे समय में मन अक्सर एक सवाल पर अटक जाता है — पड़ोसी की नई गाड़ी देखकर, किसी सहकर्मी के प्रमोशन की बात सुनकर, या रिश्तेदार के बड़े घर के बारे में जानकर मन में हल्की सी बेचैनी क्यों होती है? शास्त्र इसका बहुत सुंदर उत्तर देते हैं।

ईशावास्य उपनिषद का संदेश

ईशावास्य उपनिषद के पहले ही मंत्र में यह गूढ़ बात कही गई है:

"ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्॥"

अर्थ — इस संसार में जो कुछ भी है, चर या अचर, सब कुछ ईश्वर से व्याप्त है। इसलिए त्याग-भाव के साथ भोग करो, और किसी दूसरे के धन का लोभ मत करो।

क्या करें, क्या न करें

शास्त्र कहते हैं कि हर व्यक्ति के जीवन में जो कुछ मिला है, वह उसके अपने कर्मों और परिश्रम का फल है। दूसरे के पास क्या है, यह देखकर मन को दुखी करना व्यर्थ है। इस मंत्र से हमें दो बातें सीखने को मिलती हैं:

  • अपनाएं — जो अपने पास है उसमें संतोष रखें, और उसे बांटकर उपयोग करने का भाव रखें।
  • बचें — दूसरे की सफलता या संपत्ति देखकर ईर्ष्या और लालच के भाव से दूर रहें।

आज के लिए व्यावहारिक सीख

आज जब भी मन किसी और की उपलब्धि से तुलना करने लगे, एक पल रुककर सोचें — जो मेरे पास है, क्या मैं उसका सही उपयोग कर रहा हूं? परिवार के साथ समय बिताते हुए, काम करते हुए, या मंदिर में दर्शन करते हुए यह भाव मन को हल्का रखता है। सावन के इस पावन महीने में यह छोटा सा अभ्यास मन की शांति के लिए बहुत काम आता है।

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