दैनिक ज्ञान

दैनिक ज्ञान: तैत्तिरीय उपनिषद की सीख — मातृदेवो भव, पितृदेवो भव का असली अर्थ

प्रेमचंद्र दुबे ·

तैत्तिरीय उपनिषद की शिक्षावल्ली में एक आचार्य अपने शिष्य को विदा करते समय एक ही बात याद दिलाते हैं — यह बात आज भी उतनी ही सच है जितनी हज़ारों साल पहले थी।

शास्त्र क्या कहते हैं

तैत्तिरीय उपनिषद (शिक्षावल्ली, अनुवाक 11) में स्पष्ट आदेश है:

"मातृदेवो भव। पितृदेवो भव। आचार्यदेवो भव। अतिथिदेवो भव।"

अर्थात — माता को देवता समझो, पिता को देवता समझो, गुरु को देवता समझो और अतिथि को भी देवता समझो। यह कोई भावुक बात नहीं, बल्कि जीवन जीने का एक व्यावहारिक नियम है। घर लौटने वाले हर विद्यार्थी को गुरु यही अंतिम पाठ देते थे — पढ़ाई पूरी हो जाने के बाद भी यह ज़िम्मेदारी कभी पूरी नहीं होती।

आज के जीवन में क्या अपनाएँ

  • माता-पिता से बात करते समय मोबाइल एक तरफ रखें — उनकी बात पूरे ध्यान से सुनें।
  • घर आए किसी भी अतिथि को बोझ नहीं, सम्मान का अवसर समझें।
  • जिन्होंने जीवन में कुछ सिखाया — स्कूल के शिक्षक हों या जीवन के अनुभवी बुज़ुर्ग — उनका आभार समय-समय पर प्रकट करें।
  • बड़ों के फैसलों से असहमति हो तो भी विनम्रता से बात करें, कटु शब्दों से नहीं।

किससे बचें

शास्त्र यह भी चेताते हैं कि जल्दबाज़ी और अहंकार में माता-पिता या गुरु की बात को नज़रअंदाज़ करना, या घर आए अतिथि को अनदेखा करना — यह घर की सुख-शांति को भीतर से कमज़ोर कर देता है। सम्मान दिखावे का नहीं, आदत का विषय है। आजकल संयुक्त परिवार कम होते जा रहे हैं, बच्चे शहर से बाहर पढ़ाई-नौकरी के लिए जाते हैं — ऐसे में यह उपनिषद और भी प्रासंगिक हो जाता है, क्योंकि दूरी बढ़ने पर भी सम्मान और संपर्क बनाए रखना ही असली परीक्षा है।

छोटी-छोटी आदतें, बड़ा असर

उपनिषद का यह वचन किसी एक दिन के लिए नहीं, बल्कि रोज़ के व्यवहार के लिए है। सप्ताह में एक बार भी माता-पिता को फोन कर उनका हाल पूछना, गुरु या शिक्षक से मिलने पर झुककर प्रणाम करना, घर आए किसी रिश्तेदार या मेहमान को चाय-पानी पूछे बिना न जाने देना — ये छोटी आदतें ही परिवार को जोड़े रखती हैं। सनातन परंपरा में यही आदतें संस्कार कहलाती हैं, जो बच्चे बड़ों को देखकर सीखते हैं, उपदेश सुनकर नहीं।

यही सरल सीख लेकर परिवार के साथ मंदिर दर्शन के लिए भी समय निकालें — मंदिर में साथ जाना भी माता-पिता के प्रति सम्मान जताने का एक सुंदर तरीका है। मंदिर से जुड़े कार्यक्रमों की जानकारी के लिए कार्यक्रम पेज देखें, और ऐसे ही रोज़ के ज्ञान के लिए अन्य लेख पढ़ते रहें।

इस श्रेणी में और लेख

दैनिक ज्ञान: गीता कहती है — अपना उद्धार स्वयं करें → दैनिक ज्ञान: रामचरितमानस की सीख — सत्संग के बिना सच्चा विवेक नहीं मिलता → दैनिक ज्ञान: गुरु पूर्णिमा पर गीता का संदेश — सच्चा ज्ञान विनम्रता से मिलता है →
💬