दैनिक ज्ञान: भगवद्गीता की सीख — काम, क्रोध और लोभ, नरक के ये तीन द्वार
सुबह ऑफिस के लिए निकलते ही ट्रैफिक में गाड़ी फंस जाए, या बाज़ार में कोई चीज़ पसंद आ जाए और जेब इजाज़त न दे — ऐसे छोटे-छोटे पलों में ही मन भीतर से उबलने लगता है। भगवद्गीता की सीख कहती है कि यही वे क्षण हैं जहाँ हमारी असली परीक्षा होती है।
गीता का वचन
भगवद्गीता के सोलहवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं:
"त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः।
कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्॥"
(भगवद्गीता, अध्याय 16, श्लोक 21)
अर्थात— काम (अनियंत्रित इच्छा), क्रोध और लोभ, ये तीन आत्मा का नाश करने वाले नरक के द्वार हैं। इसलिए इन तीनों को त्याग देना चाहिए।
क्या अपनाएँ, क्या छोड़ें
शास्त्र कहते हैं कि इच्छा रखना गलत नहीं, पर इच्छा का दास बन जाना खतरनाक है। जब मन कुछ पाने के लिए बेचैन हो, तो एक पल रुककर पूछें — "क्या यह सच में ज़रूरी है?" जब गुस्सा सिर चढ़े, तो बोलने से पहले एक गहरी साँस लें। लोभ यानी ज़्यादा से ज़्यादा जमा करने की भूख, इसे संतोष से ही काटा जा सकता है।
- अपनाएँ: संतोष, धैर्य, क्षमा-भाव
- बचें: बेवजह की ज़िद, तुरंत गुस्सा, हर चीज़ जमा करने की होड़
घर के बड़े-बुज़ुर्ग अक्सर यही सिखाते आए हैं — "गुस्से में लिया फैसला अक्सर पछतावे में बदलता है।" गीता का यह श्लोक हज़ारों साल बाद भी उतना ही सच है।
आज के लिए एक छोटा संकल्प
आज दिन में जब भी गुस्सा या किसी चीज़ की तीव्र इच्छा उठे, उसे तुरंत मानने की बजाय एक मिनट रुकें। यही अभ्यास धीरे-धीरे मन को शांत बनाता है।
मंदिर परिसर में कुछ पल शांति से बैठना भी मन को स्थिर करने में मदद करता है — नज़दीकी मंदिर के दर्शन का समय जानने के लिए वेबसाइट देखें। ऐसी ही रोज़ की सीख पाने के लिए रजिस्ट्रेशन कराएँ, और अधिक लेख पढ़ने के लिए हमारा ब्लॉग देखें।