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दैनिक ज्ञान: ईशावास्य उपनिषद की सीख — त्याग-भाव से भोग करो, लालच से नहीं

प्रेमचंद्र दुबे ·

बाज़ार में किसी पड़ोसी की नई गाड़ी या किसी सहकर्मी की तरक्की देखकर मन में हल्की-सी बेचैनी जाग जाना — यह लगभग हर किसी के साथ कभी-न-कभी होता है। मन तुरंत तुलना करने लगता है, और तुलना से असंतोष जन्म लेता है। हमारे शास्त्रों ने हज़ारों साल पहले ही इस बेचैनी का इलाज बता दिया था।

ईशावास्य उपनिषद का पहला मंत्र

ईशावास्य उपनिषद, जो दस प्रमुख उपनिषदों में से एक है, अपने पहले ही मंत्र में जीवन का सार दे देता है:

"ईशा वास्यम् इदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्॥"

सरल अर्थ: इस संसार में जो कुछ भी है — चर या अचर — सब में ईश्वर का वास है। इसलिए त्याग-भाव से, यानी बिना आसक्ति के, अपने हिस्से का भोग करो। किसी और के धन या वस्तु का लालच मत करो, क्योंकि वह उसके हिस्से का है।

शास्त्र कहते हैं — आज क्या अपनाएं

  • संतोष: जो अपने पास है, पहले उसकी कद्र करें। संतोष ही सबसे बड़ा धन माना गया है।
  • त्याग-भाव: अपनी कमाई, अपनी सफलता का उपयोग करें, पर उसे अपनी पहचान न बनाएं — जरूरतमंद के साथ बाँटने का भाव रखें।
  • ईश्वर-दृष्टि: हर वस्तु, हर व्यक्ति में एक ही चेतना का वास मानने से स्वाभाविक रूप से सम्मान और करुणा बढ़ती है।

शास्त्र कहते हैं — आज किससे बचें

  • दूसरे की उन्नति से ईर्ष्या: मंत्र सीधे कहता है — किसी और के धन का लालच मत करो। तुलना मन की शांति छीन लेती है।
  • अंधी दौड़: बिना सोचे-समझे केवल पाने की होड़ में लगे रहना, जिससे न संतोष मिलता है न सुकून।
  • संग्रह की भूख: ज़रूरत से अधिक जमा करने की चिंता में वर्तमान का सुख गँवा देना।

आज का दिन एक छोटा प्रयोग करने का है — किसी एक चीज़ की तुलना दूसरों से करना बंद करें, और जो आपके पास है उसके लिए मन-ही-मन आभार व्यक्त करें। यही ईशावास्य उपनिषद की सीख का पहला कदम है।

ऐसे ही शास्त्र-आधारित ज्ञान और परंपरा की बातें हर दिन पढ़ने के लिए हमारे अन्य लेख देखें, और अपने नज़दीकी मंदिर के दर्शन का लाभ उठाएँ।

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