ज्योतिष: पंचांग के पांच अंग क्या हैं और भारतीय परंपरा में इनका क्या महत्व है
हर सुबह जब हम पंचांग में तिथि, नक्षत्र जैसे शब्द पढ़ते हैं, तो अक्सर मन में सवाल आता है — पंचांग बनता कैसे है? "पंचांग" शब्द ही इसका उत्तर देता है — पंच यानी पाँच, और अंग यानी हिस्से। भारतीय ज्योतिष परंपरा में पंचांग पाँच बुनियादी अंगों से मिलकर बनता है।
1. तिथि
चंद्रमा और सूर्य के बीच के कोणीय अंतर से तिथि तय होती है। हर 12 अंश की दूरी एक तिथि कहलाती है, और एक चंद्र मास में कुल 30 तिथियाँ होती हैं — शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से पूर्णिमा तक, फिर कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से अमावस्या तक।
2. वार
वार यानी सप्ताह का दिन — सोमवार से रविवार तक। परंपरा में हर वार किसी न किसी ग्रह या देवता से जुड़ा माना जाता है, जैसे सोमवार शिव और चंद्रमा से, शुक्रवार देवी और शुक्र ग्रह से।
3. नक्षत्र
आकाश को 27 बराबर भागों में बाँटा गया है, जिन्हें नक्षत्र कहते हैं — अश्विनी से रेवती तक। चंद्रमा एक नक्षत्र से दूसरे नक्षत्र में जाने में लगभग सवा दिन का समय लेता है। प्राचीन काल में नक्षत्रों के आधार पर ही समय और यात्रा की गणना की जाती थी।
4. योग
सूर्य और चंद्रमा की संयुक्त गणना से 27 योग बनते हैं — विष्कुम्भ से लेकर वैधृति तक। परंपरा में हर योग का अपना स्वभाव माना जाता है, जिसका उपयोग शुभ कार्यों का समय तय करने में किया जाता रहा है।
5. करण
एक तिथि का आधा भाग एक करण कहलाता है। इस तरह एक चंद्र मास में कुल 11 करण, अलग-अलग क्रम में 60 बार दोहराए जाते हैं — जिनमें से 7 चलायमान और 4 स्थिर करण होते हैं।
यह परंपरा इतनी पुरानी क्यों है
वेदांग ज्योतिष को छह वेदांगों में गिना गया है, जिसका उद्देश्य यज्ञ और अनुष्ठानों के लिए सही समय जानना था। सदियों के अवलोकन और गणना से यह पद्धति विकसित हुई और आज भी हमारे पर्व-त्योहार इसी पंचांग के आधार पर तय होते हैं।
यह जानकारी विशुद्ध रूप से पारंपरिक एवं शैक्षणिक दृष्टिकोण से दी गई है, इसका उद्देश्य किसी व्यक्तिगत भविष्यवाणी या फलादेश से नहीं है। हमारे प्रतिदिन के पंचांग और अन्य लेख पढ़ते रहें, और मंदिर से जुड़े कार्यक्रमों की जानकारी पाने के लिए रजिस्ट्रेशन करें।