बच्चों की कहानी: ध्रुव की कथा और आज का क्रिकेट मैदान
अर्णव की स्कूल क्रिकेट टीम की लिस्ट लगी थी, और उसका नाम उसमें नहीं था। कोच ने बड़े बच्चों को चुना था, अर्णव को कहा गया — "अभी तुम बहुत छोटे हो, अगले साल कोशिश करना।" वह मैदान के किनारे बैठकर रोने लगा। तभी उसके दादाजी वहां आ गए और बोले, "चलो, आज तुम्हें एक कहानी सुनाता हूं — बिल्कुल ऐसी ही एक बच्चे की, जिसका नाम था ध्रुव।"
श्रीमद्भागवत पुराण की ध्रुव कथा
दादाजी ने बताया — यह कहानी श्रीमद्भागवत पुराण में आती है। राजा उत्तानपाद के दो रानियां थीं। छोटी रानी सुरुचि का बेटा तो राजा की गोद में बैठ जाता, पर जब छोटे ध्रुव ने भी गोद में बैठना चाहा, तो सुरुचि ने कड़े शब्दों में मना कर दिया — "तुम मेरी कोख से नहीं जन्मे, तुम्हें यह अधिकार नहीं।"
ध्रुव उस समय बहुत छोटा था, पांच साल का। उसे बहुत बुरा लगा, पर उसने रोकर बैठना नहीं चुना। वह जंगल में तप करने चला गया, जहां छोटे-छोटे बच्चों के लिए रुकना भी मुश्किल था। उसने हार नहीं मानी, दिन-प्रतिदिन अपने मन को स्थिर रखा और निरंतर प्रयास करता रहा। कहा जाता है कि उसकी लगन और धैर्य से प्रसन्न होकर उसे आकाश में सदा चमकने वाला स्थान — ध्रुव तारा — प्राप्त हुआ, जो आज भी उत्तर दिशा में स्थिर दिखाई देता है।
अर्णव के लिए सीख
दादाजी ने कहा, "ध्रुव के पास भी कोई शॉर्टकट नहीं था। उसने बस एक काम किया — कोशिश करना बंद नहीं किया।" अर्णव ने पूछा, "तो मुझे क्या करना चाहिए?" दादाजी मुस्कुराए, "रोज सुबह थोड़ी प्रैक्टिस करो। बड़े भाई से बल्लेबाजी सीखो। अगली बार जब लिस्ट लगे, कोच को दिखे कि तुम पहले से बेहतर हो गए हो।"
अर्णव ने वैसा ही किया। हर सुबह स्कूल जाने से पहले वह पड़ोस के मैदान में आधा घंटा गेंदबाजी और बल्लेबाजी की प्रैक्टिस करता। कभी मन ऊबता, कभी थकान होती, पर उसे ध्रुव की कहानी याद आ जाती और वह फिर मैदान में उतर जाता।
तीन महीने बाद
अगली बार जब स्कूल में टीम चुनी गई, कोच ने अर्णव की बल्लेबाजी देखकर कहा, "तुम बहुत सुधर गए हो, इस बार टीम में हो।" अर्णव की आंखों में खुशी के आंसू थे, बिल्कुल वैसे ही जैसे कभी दुख के थे।
सीख
निरंतर प्रयास और धैर्य से बड़ी से बड़ी निराशा भी एक दिन सफलता में बदल जाती है।
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