धर्म एवं जीवन

धर्म एवं जीवन: अतिथि देवो भव — घर में मेहमानों के स्वागत का संस्कार

प्रेमचंद्र दुबे ·

शाम को अचानक कोई रिश्तेदार दरवाज़े पर आ जाए, तो आजकल पहला भाव अक्सर यही होता है — "अभी बहुत काम है, कैसे संभालेंगे?" पहले के घरों में यही पल खुशी का मौका होता था। यह बदलाव क्यों आया, इसे समझने के लिए एक पुरानी सीख की ओर लौटना ज़रूरी है।

शास्त्र क्या कहते हैं

तैत्तिरीय उपनिषद में शिष्य को दी गई शिक्षाओं में एक वाक्य बहुत प्रसिद्ध है — "अतिथि देवो भव", यानी अतिथि को देवता के समान मानो। यह केवल एक कहावत नहीं, बल्कि गृहस्थ जीवन के लिए एक व्यावहारिक आचार-संहिता थी। पुराने समय में यात्री बिना पूर्व सूचना के घर आते थे, और हर घर का यह धर्म माना जाता था कि आए हुए व्यक्ति को भोजन और विश्राम देकर ही आगे भेजा जाए।

आज के घर में इसका मतलब

आज मेहमान अक्सर फोन करके आते हैं, फिर भी कई घरों में उनका आना बोझ जैसा लगने लगा है। इसका कारण समय की कमी उतनी नहीं, जितना यह भाव कि मेहमान हमारी दिनचर्या में "बाधा" हैं। शास्त्र इसे उलट नज़रिए से देखने को कहते हैं — किसी के घर आने को सेवा और सौभाग्य का अवसर मानने की सीख देते हैं।

पुराने समय में यह भी मान्यता थी कि अतिथि के रूप में स्वयं भगवान भी परीक्षा लेने आ सकते हैं, इसलिए किसी को भूखा या निराश लौटाना अशुभ माना जाता था। आज के दौर में इतनी कठोरता संभव नहीं, पर मूल भाव — सम्मान और सहृदयता — वही रहना चाहिए।

क्या अपनाएं

  • मेहमान के आने पर पहले पानी या कुछ हल्का जलपान देने की पुरानी परंपरा बनाए रखें — यह छोटी-सी बात रिश्तों में गर्मजोशी लाती है।
  • बच्चों को भी मेहमानों के स्वागत में शामिल करें, ताकि यह संस्कार अगली पीढ़ी तक पहुंचे।
  • अपने सामर्थ्य अनुसार सरलता से स्वागत करें — दिखावे की जगह भाव को प्राथमिकता दें।

क्या टालें

  • मेहमान के सामने खीझ या अनिच्छा जाहिर करने से बचें — इससे रिश्ते में दूरी बढ़ती है।
  • स्वागत को केवल औपचारिकता न बनाएं; सच्चे मन से किया गया छोटा प्रयास भी पर्याप्त होता है।

शास्त्र कहते हैं कि जो घर अतिथि का सम्मान करता है, वहाँ सुख-समृद्धि का वास बना रहता है। यह केवल धार्मिक विश्वास नहीं, बल्कि रिश्तों को जोड़े रखने की एक व्यावहारिक जीवन-शैली है। जो बच्चे घर में यह संस्कार देखकर बड़े होते हैं, वे आगे चलकर स्वयं भी दूसरों के प्रति उदार और सहज बनते हैं — यही इस परंपरा की असली सार्थकता है।

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