पिपलेश्वर महादेव — नाम में ही इस स्वरूप का रहस्य है: पीपल के ईश्वर। जहाँ अश्वत्थ (पीपल) और ईश्वर (शिव) का संगम हो, वहाँ गीता की दो विभूतियाँ एक साथ विराजती हैं — क्योंकि श्रीकृष्ण ने कहा है, वृक्षों में मैं पीपल हूँ और रुद्रों में मैं शंकर हूँ।
लिंग पुराण के अनुसार शिवलिंग अनादि-अनंत ज्योति स्तंभ का प्रतीक है — वह कथा प्रसिद्ध है जब ब्रह्मा और विष्णु उस ज्योतिर्लिंग का आदि-अंत खोजने निकले और दोनों असफल रहे। लिंग-रूप में शिव-पूजा यह स्मरण कराती है कि परमात्मा किसी आकार में बँधता नहीं। भारतवर्ष में वृक्ष-मूल में शिवलिंग की स्थापना की परंपरा अत्यंत प्राचीन है — विशेषकर पीपल और वट के नीचे, जहाँ वृक्ष की छाया स्वयं छत्र बन जाती है।
पिपलेश्वर स्वरूप की उपासना प्रकृति और परमात्मा की अभिन्नता की साधना है। पीपल प्राणवायु देता है, महादेव प्राण के स्वामी हैं — दोनों का एकत्र पूजन जीवन-दायिनी शक्ति के दोनों रूपों के प्रति कृतज्ञता है। यह दृष्टि भारतीय संस्कृति की उस गहरी समझ का प्रमाण है जो पर्यावरण-रक्षा को पूजा का अंग बनाती है।
सोमवार और प्रदोष तिथि को जलाभिषेक, बेलपत्र और भस्म अर्पण की परंपरा है। श्रावण मास में प्रतिदिन अभिषेक का विशेष फल कहा गया है; महाशिवरात्रि यहाँ का प्रमुख पर्व है। शिव-आराधना का महामंत्र: ॐ नमः शिवाय; अभिषेक के समय रुद्राष्टाध्यायी या महामृत्युंजय मंत्र का पाठ किया जाता है।