महादेव के धाम में हनुमान जी की उपस्थिति कोई संयोग नहीं — शास्त्र हनुमान जी को साक्षात् शिव का ही अवतार कहते हैं। शिव पुराण की परंपरा में वे ग्यारहवें रुद्र के अवतार हैं, इसीलिए उनका एक नाम 'रुद्रावतार' भी है।
कथा है कि जब विष्णु ने राम-अवतार लिया, तब शिव जी ने भी अपने आराध्य की सेवा का सौभाग्य पाने के लिए वानर रूप में अवतार लेने का संकल्प किया — वायु देव के अंश से अंजना के गर्भ से हनुमान जी का जन्म हुआ। यही कारण है कि हनुमान जी में शिव-तत्व के दोनों लक्षण पूर्णता से मिलते हैं: रुद्र का अपार बल और महादेव की परम विनम्रता। तुलसीदास जी हनुमान चालीसा में इसी ओर संकेत करते हैं: "शंकर सुवन केसरी नंदन।"
रुद्रावतार हनुमान की उपासना शिव और राम — दोनों धाराओं का संगम है। यह उस गहरे सत्य की साधना है कि शैव और वैष्णव कोई भेद नहीं: स्वयं शिव राम के भक्त बने, और राम ने शिव की पूजा की। जो हनुमान जी को भजता है, वह एक साथ शिव के बल और राम की मर्यादा — दोनों का अधिकारी बनता है।
महादेव के मंदिर में हनुमान-दर्शन की परंपरा है — पहले शिवलिंग का अभिषेक, फिर हनुमान जी को सिंदूर। मंगलवार और शनिवार प्रमुख दिन हैं; श्रावण के मंगलवार यहाँ दुर्लभ संयोग माने जाते हैं जब शिव और उनके रुद्रावतार दोनों की आराधना एक ही दिन फलित होती है। मंत्र: "मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्। वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये॥"