देवों के देव महादेव — शिव जी संहार के नहीं, कल्याण के देवता हैं। 'शिव' शब्द का अर्थ ही है — कल्याणकारी। वे वैरागी होकर भी परिवार के आदर्श हैं, श्मशानवासी होकर भी मंगलदाता हैं। यही विरोधाभासों का समन्वय शिव-तत्व की सबसे बड़ी शिक्षा है।
समुद्र मंथन की कथा शिव जी के स्वभाव का सार है। जब देवताओं और असुरों के मंथन से हलाहल विष निकला और सृष्टि के प्राण संकट में पड़े, तब कोई उसे लेने को तैयार न हुआ। महादेव ने लोक-कल्याण के लिए वह विष स्वयं पी लिया और उसे कंठ में धारण कर लिया — तभी से वे 'नीलकंठ' कहलाए। पुराण कहते हैं: जो दूसरों का विष पी ले और अमृत बाँट दे, वही महादेव है।
शिवलिंग निराकार ब्रह्म का प्रतीक है — न आदि, न अंत। शिव-उपासना साधक को सिखाती है कि सरलता ही सबसे बड़ा ऐश्वर्य है: महादेव को न स्वर्ण चाहिए, न छप्पन भोग — केवल जल, बेलपत्र और सच्चा मन। योग परंपरा उन्हें 'आदियोगी' — प्रथम योगी और प्रथम गुरु — के रूप में स्मरण करती है।
सोमवार शिव जी का प्रिय दिन है और श्रावण मास उनकी आराधना का पर्व-काल। जलाभिषेक, बेलपत्र, धतूरा और भस्म अर्पित करने की परंपरा है। महाशिवरात्रि पर रात्रि-जागरण और चार प्रहर की पूजा का विशेष विधान है। मूल मंत्र: ॐ नमः शिवाय। रोग और भय से रक्षा हेतु महामृत्युंजय मंत्र का जप किया जाता है।