संकटमोचन हनुमान — यह नाम ही आश्वासन है। भारतीय जनमानस में जब भी संकट शब्द आता है, उसके साथ ही 'संकटमोचन' का स्मरण आता है: "संकट कटै मिटै सब पीरा, जो सुमिरै हनुमत बलबीरा।"
हनुमान जी अष्ट सिद्धियों और नव निधियों के दाता हैं — यह वरदान उन्हें माता जानकी से मिला: "अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता, अस बर दीन जानकी माता।" रामायण में बार-बार वही संकट के क्षण में समाधान बनकर खड़े होते हैं — लक्ष्मण को शक्ति लगी तो रातोंरात संजीवनी सहित पूरा द्रोणागिरि पर्वत उठा लाए; अहिरावण राम-लक्ष्मण को पाताल हर ले गया तो पाताल तक जा पहुँचे। कथा का सार यह है कि हनुमान जी के लिए 'असंभव' शब्द ही नहीं है — शर्त केवल यह है कि कार्य धर्म का हो।
संकटमोचन की उपासना भय-नाश की साधना है। तुलसीदास जी लिखते हैं: "भूत पिसाच निकट नहिं आवै, महाबीर जब नाम सुनावै।" मनोविज्ञान की भाषा में कहें तो हनुमान-स्मरण साधक के भीतर के भय, दुर्बलता और आत्म-संदेह का उपचार है — क्योंकि जिसका आदर्श स्वयं शक्ति का सागर हो, वह निर्बल कैसे रहेगा?
मंगलवार और शनिवार को सिंदूर-चोला चढ़ाने, चमेली के तेल का दीपक जलाने और हनुमान चालीसा के पाठ की परंपरा है। संकट के समय बजरंग बाण का पाठ विशेष प्रभावी माना जाता है। मंत्र: ॐ हं हनुमते रुद्रात्मकाय हुं फट्।