दीह बाबा पूर्वांचल और भोजपुरी क्षेत्र की सबसे जीवंत लोक-देव परंपरा हैं — गाँव के संस्थापक स्थान-देवता, जिन्हें हर बसावट का प्रथम रक्षक माना जाता है। 'दीह' शब्द ही बसे हुए स्थान (डीह/टीले) का वाचक है — अर्थात वह देव जो इस भूमि पर बसने वाली पहली पीढ़ी से लेकर आज तक पूरे गाँव के साक्षी और संरक्षक हैं।
पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के लगभग हर गाँव की सीमा पर दीह बाबा (कहीं डीह बाबा, कहीं ब्रह्म बाबा) का थान मिलता है — प्रायः किसी प्राचीन वृक्ष के नीचे, खुले आकाश तले। परंपरा कहती है कि गाँव में कोई भी मांगलिक कार्य — विवाह का पहला निमंत्रण, नई फसल का पहला दाना, नए घर की पहली ईंट — दीह बाबा को अर्पित किए बिना पूर्ण नहीं होता। यह 'स्थान देवता' की वही अवधारणा है जिसे शास्त्र 'वास्तु पुरुष' और 'क्षेत्रपाल' कहते हैं।
दीह बाबा की उपासना कृतज्ञता की साधना है — उस भूमि के प्रति जिस पर हम बसे हैं, और उन पूर्वजों के प्रति जिन्होंने इस बसावट को संभव बनाया। यह परंपरा सिखाती है कि रक्षा केवल बल से नहीं, आशीर्वाद से भी होती है, और आशीर्वाद केवल स्मरण से मिलता है।
दीह बाबा के थान पर जल, अक्षत, बताशा और दीपक अर्पित करने की सहज लोक-परंपरा है — यहाँ कर्मकांड की जटिलता नहीं, भाव की सरलता ही विधि है। विशेष अवसरों पर पूड़ी-हलवे का भोग और मनौती पूर्ण होने पर सामूहिक प्रसाद वितरण होता है।